बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की 46वीं खरीफ अनुसंधान परिषद की बैठक आयोजित

खरीफ अनुसंधान परिषद

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की 46वीं खरीफ अनुसंधान परिषद की बैठक आयोजित

उच्च प्रोटीन एवं सूक्ष्म पोषकतत्वों से भरपूर फसल किस्में विकसित करें: डॉ टीआर शर्मा

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की 46वीं खरीफ अनुसंधान परिषद की बैठक आयोजित 

न्यूज़11 भारत 
रांची/डेस्क:
प्रख्यात पादप आनुवंशिकीविद् एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ टीआर शर्मा ने कहा कि वर्तमान बाजार की मांग को देखते हुए उच्च उपज देने वाली, सूखा-सहिष्णु, रोग एवं कीट-प्रतिरोधी तथा उच्च प्रोटीन एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों से युक्त फसल किस्मों का विकास किया जाना चाहिए.

गुरुवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) की 46वीं खरीफ अनुसंधान परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि फसलों के जंगली संबंधी पौधों (क्रॉप वाइल्ड रिलेटिव्स) से उपयोगी जीनों की पहचान और उनका उपयोग करने के लिए सुनियोजित एवं निरंतर प्रयास आवश्यक हैं. उन्होंने कहा कि प्री-ब्रीडिंग को सभी प्रजनन (ब्रीडिंग) कार्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वांछित गुणों के चयन और नई किस्म विकसित करने में एक दशक से अधिक समय लग जाता है.

विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों और शिक्षकों की भारी कमी को देखते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि स्नातकोत्तर (पीजी) एवं पीएचडी के विद्यार्थियों को वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन एवं निगरानी में अनुसंधान कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए.

आईसीएआर के पूर्व सहायक महानिदेशक (पशु उत्पादन एवं प्रजनन) डॉ वीके सक्सेना ने स्वदेशी पशु नस्लों के चरित्रांकन एवं उनका पंजीकरण करनाल स्थित राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर) में कराने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि पिछले चार-पांच वर्षों में केवल 26 नस्लों का ही पंजीकरण हो पाया है. उन्होंने कहा कि पशु उत्पादन की कुल लागत का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा चारे एवं आहार पर खर्च होता है, इसलिए कम लागत वाले चारे एवं पशु आहार के विकास के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि देश में पोल्ट्री क्षेत्र 6-7 प्रतिशत की वार्षिक दर से सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है और झारखंड में भी इसकी अपार संभावनाओं का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए.

बीएयू के कुलपति डॉ एससी दुबे ने झारखंड के सीमित संसाधनों वाले किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कम लागत वाली एवं कृषि प्रणाली के अनुकूल तकनीकों के विकास पर बल दिया. उन्होंने पशुपालन क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने के लिए राज्य में पशुओं एवं पक्षियों के रोग निदान तथा टीकाकरण सुविधाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता भी बताई.

बैठक में बीएयू के पूर्व कुलपति डॉ जीएस दुबे, भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईएबी), रांची के निदेशक डॉ सुजय रक्षित, आईसीएआर अनुसंधान संस्थान, पलांडू के प्रमुख डॉ अवनी कुमार सिंह, पूर्व निदेशक (अनुसंधान) डॉ डीके सिंह ‘द्रोण’, पशु चिकित्सा संकाय के पूर्व अधिष्ठाता डॉ बीके राय एवं डॉ एमके गुप्ता सहित अन्य गणमान्य वैज्ञानिक उपस्थित रहे और विचार-विमर्श में भाग लिया.

अनुसंधान निदेशक डॉ पीके सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया तथा गत वर्ष की अनुसंधान उपलब्धियों एवं कार्यवाही प्रतिवेदन का प्रस्तुतिकरण किया. इस अवसर पर अतिथियों ने वर्ष 2025 की खरीफ अनुसंधान उपलब्धियों पर आधारित दस्तावेज का विमोचन किया. विश्वविद्यालय में आजीवन योगदान के लिए तीन यूनिवर्सिटी प्रोफेसर एवं एक सहायक प्राध्यापक—डॉ एमएस मलिक, डॉ एमके गुप्ता, डॉ पीबी साहा तथा डॉ कुमार शैलेन्द्र मोहन—को सम्मानित किया गया. इसके अलावा गुमला जिले के सिसई के प्रगतिशील किसान शैलेन्द्र कुमार भगत को भी सम्मानित किया गया. उद्घाटन सत्र का संचालन शशि सिंह ने किया, जबकि उप अनुसंधान निदेशक डॉ सीएस महतो ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया.

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