राजनीतिक दांव-पेच

पश्चिम बंगाल के सियासी कांटे में मछली! हिल्सा, रोहू, कतला, शोल पर छिड़ा है संग्राम, बंगाल अबकी बार किसके नाम?

ममता ने चला है ‘माछ-भात बंगाली’ का दांव, बीजेपी की कौन-सी चाल लगायेगी पार चुनावी नाव

By : News11 Bharat
पश्चिम बंगाल के सियासी कांटे में मछली! हिल्सा, रोहू, कतला, शोल पर छिड़ा है संग्राम, बंगाल अबकी बार किसके नाम?

न्यूज11  भारत

रांची/डेस्क: पश्चिम बंगाल के चुनावी और राजनीतिक माहौल ने नया मोड ले लिया है. हर चुनाव में नए-नए दांव चलने वाली पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी ने इस बार भी एक नया और बड़ा दांव चला है. बड़ा दांव इसे इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि यह दांव बंगाल की अस्मिता से जुड़ा है. यह सभी जानते हैं कि बंगाल और मछली का चोली-दामन का साथ है, इसके बिना बंगाली समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है. ममता बनर्जी ने इसी मछली को अपना चुनावी मोहरा बना लिया है. उसके लेकर वह जो दांव चल रही हैं, उसका काट भाजपा खोजने में लगी है.

हाल के कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो लगभग हर पार्टी ने विकास के दावे ठोंक कर सत्ता का रास्ता तलाशने का काम किया है. ऐसा नहीं है कि पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं होगा, ऐसे वादे पश्चिम बंगाल चुनाव में भी किये जायेंगे. लेकिन इस बार के चुनावी समंदर से ममता बनर्जी ने जो कुछ ढूंढ कर निकाला है, वह कुछ और नहीं बल्कि मछली है. और इसी से वह बंगाल के अनोखा चुनावी रंग देने में लगी हैं.

ममता बनर्जी ने दिया है माछ-भात बंगाली का नारा

सुनने में यह भले अजीब लगे, बंगाल का सबसे पसंदीदा भोजन माछ-भात घर की थाली से बाहर निकल कर चुनावी मंचों की शोभा बढ़ा रही है. तृणमूल कांग्रेस ने ‘माछ-भात बंगाली’ का नारा बुलंद कर इसे चुनावी रणनीति के केंद्र में बिठा दिया है. आम बंगाली के भोजन की आत्मा को तृणमूल कांग्रेस ने वोट पाने का सबसे बड़ा औजार बना दिया है. 

शाकाहारी बाहरी का डर दिखाने के लिए हुए है माछ-भात की राजनीति एंट्री

ममता बनर्जी माछ-भात बंगाली का नारा बहुत सोच-समझ कर दिया है. हालांकि यह समझा जा सकता है कि यह महज चुनावी नारा है, लेकिन ममता बनर्जी और तृणमूल के लिहाज से यह काफी कारगर सिद्ध होने वाला है. वह दरअसल, पश्चिम बंगाल, खासकर बंगालियों को भाजपा का भय दिखाना चाहती है. उनका पश्चिम बंगाल के लोगों से कह रही हैं कि अगर भाजपा सत्ता में आ जायेगी तो वह आपका माछ-भात बंद कर देगी. व भाजपा को ‘शाकाहारी और बाहरी’ पार्टी के रूप में पेश कर यह भी कह रही है कि इस पार्टी का बंगाल की मिट्टी और परंपराओं से कोई मेल नहीं है. भाजपा वाले न तो खुद मछली, मांस या अंडा खाएंगे और न ही आपको खाने देंगे. 

तृणमूल के नारों में माछ-भात की कैसे हुई एंट्री?

आज तृणमूल कांग्रेस जिस माछ-भात का नारा देने में अपना पूरा जी-जान लगाये हुए हैं, उसकी उसके नारों में एंट्री इत्तेफाकन हुई है. माछ-भात की एंट्री केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बंगाल में प्रस्तावित 15 दिनों के प्रवास ऐलान के बाद हुई. अमित शाह के इस ऐलान के बाद तृणमूल कांग्रेस ने सोशल मीडिया एक पोस्ट किया जिसमें उसने शाह का स्वागत भांति-भाति की मछली से करने की बात कही, फिर इसी पोस्ट से माछ-भात का नारा देने का आइडिया पार्टी के दिमाग में आया.  और अब तो माछ-भात टीएमसी का एक बड़ा स्लोगन बन गया है.

पश्चिम बंगाल और मछली का रिश्ता

देश के विभिन्न हिस्सों में मछली प्रमुख खाद्य पदार्थ है. पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश या फिर केरल मछली उत्पादन और उपभोग में काफी आगे हैं.  किन्तु भौगोलिक स्थिति बंगाल को मछली से विशेष रूप से जोड़ती है. बंगालियों के लिए मछली सिर्फ भोजन का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक संस्कृति हैं. बंगाल में तो कई मंदिरों में मछली को ‘भोग’ के रूप में अर्पित की जाती है. दुर्गा पूजा में मां की विदाई ‘जोड़ा इलिश’ (दो हिल्सा मछली) के साथ होती है. उत्तरी बंगाल में ‘शोल माछ’ वहां के स्थानीय देवता का वाहन माना जाता है. मछली के इसी भावनात्मक जुड़ाव को ही ममता बनर्जी ने अपना चुनावी हथियार बना लिया है. 

माछ-भात को भाजपा ने ममता बनर्जी और टीएमसी का दुष्प्रचार बताया

तृणमूल कांग्रेस के इस नारे पर भाजपा ने पलटवार भी किया है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कहा कि यह टीएम का महज ‘दुष्प्रचार’ है.  इतना ही नहीं, बिधाननगर से भाजपा उम्मीदवार शरद्वत मुखोपाध्याय ने पांच किलो की भारी-भरकम कतला मछली हाथ में लेकर जुलूस निकाला और मतदाताओं में प्रचारित करने का प्रयास किया कि यह सिर्फ दुष्प्रचार का एक बहाना है, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है. पांडवेश्वर में भाजपा उम्मीदवार जितेंद्र नाथ तिवारी ने भी एक ‘मछली जुलूस’ निकाला. जुलूस में वह अपने समर्थकों के साथ टोकरियों में जिंदा मछलियां लेकर चल रहे थे.

पश्चिम बंगाल और मछली

इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम बंगाल और मछली का चोली-दामन का नाता है. यह तो वहां हर वर्ष होने वाली खपत ही बताती है कि वहां मछली की क्या अहमियत है. एक आंकड़े के अनुसार, हर साल करीब 8.36 लाख टन मछली पश्चिम बंगाल के लोग खा जाते हैं. अगर इसे राष्ट्रीय स्तर पर इसकी तुलना करें तो यह राष्ट्रीय औसत के लगभग दोगुनी है. फिर बंगालियों के लिए मछली जन्म, मृत्यु, शादी, उत्सव, श्राद्ध का एक अहम हिस्सा है. यानी इसके बिना बंगालियों का कोई आयोजन पूर्ण नहीं माना जा सकता है.

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