यहां शादी के बाद दुल्हन जाती है पड़ोसी के घर? जानें इस अनोखे रिवाज के बारे में, जिसने सबको चौंकाया

यहां शादी के बाद दुल्हन जाती है पड़ोसी के घर? जानें इस अनोखे रिवाज के बारे में, जिसने सबको चौंकाया

यहां शादी के बाद दुल्हन जाती है पड़ोसी के घर जानें इस अनोखे रिवाज के बारे में जिसने सबको चौंकाया

न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क:
चीन अपनी सांस्कृतिक विविधताओं के लिए जाना जाता है, लेकिन वहां के कुछ रिवाज इतने अनोखे है कि वे दुनिया को हैरान कर देते हैं. ऐसा ही एक रिवाज है, जिसमें शादी के बाद दुल्हन अपने पति का घर छोड़कर पड़ोसी के यहां रहने चली जाती हैं. यह परंपरा चीन के कुछ हिस्सों में आज भी निभाई जाती हैं.

लालटेन उत्सव बना वर्जित पर्व
चीन में लालटेन उत्सव को रोशनी, उम्मीद और खुशहाली का प्रतीक माना जाता हैं. यह पर्व चंद्र कैलेंडर के पहले महीने की 15वीं तारीख को मनाया जाता है लेकिन उत्तरी और पूर्वोत्तर चीन के कुछ इलाकों में नवविवाहित महिलाओं के लिए यह उत्सव वर्जित माना जाता हैं. शादी के बाद पहली बार आने वाले लालटेन उत्सव पर नई दुल्हन को अपने पति के घर में रहने की अनुमति नहीं होती.

‘लालटेन से छिपने’ की रस्म
इस परंपरा को स्थानीय भाषा में डुओडेंग कहा जाता है, जिसका अर्थ है लालटेन से छिपना. इस रस्म के तहत दुल्हन को त्योहार की रात ससुराल छोड़कर किसी दूसरे घर में शरण लेनी पड़ती हैं. वह न तो ससुराल में रह सकती है और न ही लालटेन की रोशनी देख सकती हैं. कुछ इलाकों में तो दुल्हन मायके भी नहीं जा सकती. ऐसे में वह पड़ोसी, मामा या किसी रिश्तेदार के घर जाकर रहती हैं.

क्यों माना जाता है ये जरूरी?
लोक मान्यताओं के अनुसार, अगर नवविवाहित महिला लालटेन उत्सव के दौरान ससुराल में रहती है, तो इससे परिवार पर अनहोनी आ सकती हैं. माना जाता है कि इससे ससुराल वालों की सेहत बिगड़ सकती है या दुर्भाग्य दस्तक दे सकता हैं. कुछ कहानियों में तो यहां तक कहा गया है कि अगर दुल्हन ने लालटेन देख ली, तो उसकी सास की आंखों की रोशनी जा सकती हैं.

इस रिवाज से जुड़ी एक और मान्यता और भी चौंकाने वाली हैं. कहा जाता है कि अगर विवाहित बेटी लालटेन उत्सव के दौरान अपने मायके में रहती है या वहां लालटेन देखती है, तो उसके माता-पिता पर गरीबी या संकट आ सकता हैं. कुछ कथाओं में पिता की मृत्यु तक की आशंका जताई जाती हैं. इसी कारण दुल्हन न ससुराल में रहती है, न मायके में बल्कि किसी तीसरे स्थान पर छिपकर रहना ही सुरक्षित माना जाता हैं.

तीन साल तक निभानी पड़ती है परंपरा
उत्तरी चीन के कई इलाकों में यह रस्म केवल एक साल नहीं, बल्कि लगातार तीन वर्षों तक निभाई जाती हैं. इस दौरान दुल्हन को सादे कपड़े पहनने होते है और शादी या वैवाहिक जीवन से जुड़ी बातचीत से भी बचना पड़ता हैं. 

कहां से शुरू हुई यह परंपरा?
इतिहासकारों के मुताबिक, इस रिवाज की जड़ें मांचू समुदाय की पुरानी विवाह परंपराओं से जुड़ी है, जहां दुल्हन को शादी के बाद पहले साल मायके में रहने की अनुमति होती थी. समय के साथ यह परंपरा बदलकर ‘लालटेन से छिपने’ की रस्म बन गई. एक अन्य मत के अनुसार, लालटेन को पूर्वजों का प्रतीक माना जाता था. नई दुल्हन का लालटेन से दूर रहना, परिवार की वंश परंपरा में आने वाली पीढ़ी के लिए जगह बनाने का प्रतीक था.

हालांकि अब समय बदल रहा हैं. कुछ परिवार इस परंपरा को निभाने के लिए दुल्हन को यात्रा या छोटी छुट्टी पर भेज देते हैं. इससे रस्म भी पूरी हो जाती है और आधुनिक जीवनशैली भी बनी रहती हैं. फिर भी, चीन के कई हिस्सों में यह अनोखा रिवाज आज भी परंपरा और आस्था के साथ निभाया जा रहा हैं.

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