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रांची/डेस्क: ईरान युद्ध से उत्पन्न हुआ तेल संकट सिर्फ उपभोक्ता देशों को ही परेशान नहीं कर रहा, बल्कि तेल उत्पादकों को भी परेशान कर रहा है. विश्व की ऊर्जा की बड़ी सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर है, इस कारण तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो गयी है. इस समस्या से तेल उत्पादक खाड़ी देश, जैसे- संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत भी परेशान हो उठे हैं, और अब वे ऊर्जा की सप्लाई के वैकल्पिक उपायों पर विचार करने लगे हैं. क्योंकि तेल अगर दुनिया की आवश्यकता है तो उस तेल के बदलने में होने वाली आदमनी ही इन देशों की अर्थव्यवस्था का बड़ा जरिया है. इसलिए व देश चाहते हैं कि ऐसी योजना बनायी जाये जो न सिर्फ वर्तमान परिस्थिति से निबट पाये, बल्कि भविष्य की भी चिंता से मुक्त कर सके.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सुझाई योजना पर विचार कर रहे खाड़ी देश
हम यहां जिस वैकल्पिक योजना का जिक्र कर रहे हैं और जिस पर खाड़ी के देश विचार कर रहे हैं, दरअसल, यह योजना खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बनाई और सुझाई हुई है, जो कि वर्तमान वैश्विक संकट से काफी पहले ही तैयार कर ली गयी योजना है, लेकिन इस पर काम लंबे समय से अटका हुआ है
होर्मुज को बाय पास करने की क्या है योजना?
खाड़ी देश होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये ऊर्जा सप्लाई पर निर्भर नहीं रह कर, बल्कि उसको बायपास कर नए तेल परिवहन मार्गों पर विचार कर रहे हैं. जो कि पाइपलाइन नेटवर्क के साथ सड़क मार्ग को भी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. तेल उत्पादक देशों को एहसास हो गया है कि वे तेल निर्यात के लिए केवल एक चोकपॉइंट पर निर्भर नहीं रह सकते. भविष्य की स्थिरता के लिए पाइपलाइनों, रेलवे और सड़कों का व्यापक नेटवर्क बनाना सबसे ज्यादा व्यावहारिक है. ताकि भविष्य में अगर किसी देश के द्वारा कोई व्यवधान उत्पन्न होता है तो उनके पास वैकल्पिक उपाय शेष रहे.
इन विकल्पों पर खाड़ी देश कर रहे विचार
- सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का विस्तार, जो कि 1,200 किलोमीटर लंबी है और सऊदी अरब का तेल लाल सागर के तट (यानबू बंदरगाह) तक जाती है. यह पाइप लाइन होर्मुज को पूरी तरह से बायपास करती है. सऊदी अरब इस पाइपलाइन के विस्तार पर विचार कर रहा है.
- खाड़ी देश 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा' (आईएमईसी) पर भी विचार कर रहा है. ऐसा इसलिए, क्योंकि इस गलियारे के माध्यम से न सिर्फ पाइपलाइन, बल्कि रेलवे और सड़कों नेटवर्क से भी अरब प्रायद्वीप को भूमध्य सागर, इस्राइल के हाइफा बंदरगाह या मिस्र के बंदरगाहों को जोड़ा जा सकता है. इस्राइली कंपनियां भी भविष्य का आशंका को देखते हुए -दूसरे के साथ मिलकर पाइपलाइन, रेलवे और जमीनी नेटवर्क के लिए सहमत हैं.
- यूएई हबशान-फूजैरह पाइपलाइन की क्षमता को तत्काल बढ़ाने पर विचार कर रहा है. फिलहाल यह पाइपलाइन 380 किलोमीटर लंबी है जो उसके तेल को ओमान की खाड़ी तक पहुंचाती है. "प्लान बी" के तहत दूसरी नई पाइपलाइन बनाने की भी योजना तैयार कर रहा है.
- इराक-तुर्की क्रूड ऑयल पाइपलाइन को भी अच्छे विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. यह इराक को तुर्की के भूमध्यसागर स्थित तट- सेहान से जोड़ती है. इसके अलावा, इराक से जॉर्डन, सीरिया या तुर्की होते हुए नए क्रॉस-बॉर्डर मार्गों का भी विकल्प तलाशा जा रहा है.
- सऊदी अरब लाल सागर के तट पर अतिरिक्त निर्यात टर्मिनल विकसित करने को तैयार है.
- एक अन्य योजना दक्षिण में ओमान के बंदरगाहों तक पाइपलाइन से तेल ले जाने को भी एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है.
किस योजना से भारत को होगा फायदा
खाड़ी देशों से तेल मंगाने के विकल्प को लेकर भारत भी सतर्क निगाहें रखे हुए है. भारत-का ध्यान मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा' (आईएमईसी) पर फोकस है. ऐसा इसलिए, क्योंकि एकीकृत परिवहन नेटवर्क के माध्यम से भारत को मध्य पूर्व (खाड़ी देशों) के रास्ते यूरोप को जोड़ा जा सकता है. इस गलियारे पाइपलाइन नहीं बिछाई जाएगी, बल्कि यह बंदरगाहों, रेलवे, सड़कों के एक व्यापक संयुक्त नेटवर्क विकसित किया जायेगा. यह कॉरिडोर भारत से शुरू होकर यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन और इस्राइल से गुजरते हुए भूमध्य सागर तक जाएगा, साथ ही यूरोप को भी जोड़ेगा. सबसे बड़ी बात यह है कि ईरान संकट तो आज की समस्या है, इस कोरिडोर की घोषणा तो सितंबर 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन में ही हो चुकी है.
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