एक मछली के लिए उतरी नौसेना! जानें क्या खास है हिल्सा में, जिसके पीछे पागल है पूरी दुनिया

एक मछली के लिए उतरी नौसेना! जानें क्या खास है हिल्सा में, जिसके पीछे पागल है पूरी दुनिया

एक मछली के लिए उतरी नौसेना जानें क्या खास है हिल्सा में जिसके पीछे पागल है पूरी दुनिया

न्यूज़11 भारत
रांची/डेस्क:
बांग्लादेश में एक ऐसी मछली है जिसके लिए सेना को भी मैदान में उतरना पड़ा हैं. नाम है हिल्सा, जो देश की राष्ट्रीय मछली और करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी का साधन. इस मछली की बढ़ती मांग और घटती संख्या को देखते हुए बांग्लादेश सरकार ने प्रजनन काल के दौरान विशेष सुरक्षा अभियान शुरू किया हैं. नौसेना के युद्धपोत, गश्ती हेलीकॉप्टर और ड्रोन जैसी तकनीकों से लगातार निगरानी रखी जा रही है ताकि अवैध मछली पकड़ने पर रोक लगाई जा सके.


हिल्सा मछली क्यों है इतनी खास?
हिल्सा को बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सबसे स्वादिष्ट और पौष्टिक मछली माना जाता हैं. हर साल यह समुद्र से नदियों की ओर लौटती है ताकि अंडे दे सके. खासकर पद्मा नदी और गंगा के डेल्टा क्षेत्र में इसकी भारी संख्या पाई जाती हैं. यही कारण है कि प्रजनन काल में इसकी सुरक्षा बेहद जरूरी हो जाती हैं. ढाका के बाजारों में यह मछली 2,200 टका (करीब 18 डॉलर) प्रति किलो तक बिकती हैं. भारत के पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में इसकी जबर्दस्त मांग है, जहां त्योहारों और खास मौकों पर यह सबसे लोकप्रिय व्यंजन होती हैं.


तीन हफ्तों का प्रतिबंध और सेना की तैनाती
बांग्लादेशी अधिकारियों ने 4 से 25 अक्टूबर तक नदियों में हिल्सा पकड़ने पर सख्त प्रतिबंध लगाया हैं. इंटर-सर्विस पब्लिक रिलेशंस के मुताबिक, प्रतिबंध लागू कराने के लिए 17 नौसेना युद्धपोत और गश्ती हेलीकॉप्टर तैनात किए गए हैं. इनकी मदद से 24 घंटे निगरानी की जा रही है ताकि कोई भी मछुआरा चुपके से अवैध शिकार न कर सके.


मछुआरों की मुश्किलें
प्रतिबंध का सबसे बड़ा असर मछुआरों पर पड़ता हैं. लाखों लोग सीधे तौर पर हिल्सा पकड़ने पर निर्भर हैं. सरकार ने प्रत्येक मछुआरे परिवार को इस अवधि में 25 किलो चावल देने का ऐलान किया है, लेकिन मछुआरों का कहना है कि यह उनकी जरूरतों के लिए बहुत कम हैं. 60 वर्षीय मछुआरे सत्तार माझी कहते है, “ये तीन हफ़्ते हमारे लिए बेहद कठिन होते हैं. हमारे पास कोई और काम नहीं, इसलिए जीवनयापन करना मुश्किल हो जाता हैं.”


घटती संख्या और वैज्ञानिकों की चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्र के बढ़ते स्तर और नदियों के निचले इलाकों में हो रहे बदलाव के कारण हिल्सा की संख्या लगातार कम हो रही हैं. साथ ही, जहाजों की आवाजाही और शोर भी इसके प्रजनन में बाधा डालते हैं. वर्ल्डफिश की इको-फिश परियोजना के पूर्व प्रमुख एमडी अब्दुल वहाब ने सुझाव दिया कि निगरानी के लिए नौसेना की जगह ड्रोन का इस्तेमाल बेहतर विकल्प हो सकता है, क्योंकि हिल्सा को प्रजनन के लिए शांत और निर्बाध जल की जरूरत होती हैं.


बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ी मछली
हिल्सा सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की धड़कन भी हैं. देश के कुल मछली उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा अकेले हिल्सा से आता हैं. हर साल करीब 3.87 लाख टन हिल्सा का उत्पादन होता है, जिसका बाजार मूल्य 158.7 अरब टका हैं. इतना ही नहीं, देश के जीडीपी में भी यह करीब 1 प्रतिशत का योगदान करती हैं. पिछले साल बांग्लादेश को हिल्सा के लिए भौगोलिक पहचान (GI टैग) भी मिला, जिसने इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत कर दी हैं.


भारत के पश्चिम बंगाल में हिल्सा की मांग सबसे ज्यादा हैं. गंगा और इसके डेल्टा क्षेत्र में भारतीय मछुआरे भी इस मछली को पकड़ते हैं ताकि कोलकाता जैसे महानगरों की जरूरत पूरी हो सके. खासकर दुर्गा पूजा और अन्य त्योहारों में बंगालियों के लिए हिल्सा का महत्व किसी भी पारंपरिक व्यंजन से कम नहीं हैं. दुनिया में करीब 75 फीसदी हिल्सा बांग्लादेश से आती हैं. इतनी बड़ी संख्या में उपलब्ध होने के बावजूद, यह मछली अब खतरे में हैं. अवैध शिकार और पर्यावरणीय बदलावों से इसकी संख्या घट रही हैं. शायद यही वजह है कि इस बार बांग्लादेश ने हिल्सा की रक्षा के लिए नौसेना और हेलीकॉप्टर तक तैनात कर दिए. 


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