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रांची/डेस्क: किडनी को शरीर का प्राकृतिक फ़िल्टर माना जाता है, जो रोज़ लाखों ज़हरीले तत्वों को बाहर निकालती है लेकिन समस्या यह है कि किडनी ज्यादातर बिना लक्षणों के नुकसान झेलती रहती है, और जब तक लोगों को पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती हैं. इसी चिंता को दूर करने वाली एक नई वैज्ञानिक खोज सामने आई है, जिसने किडनी रोगियों और डॉक्टरों के लिए नई उम्मीद जगा दी हैं.
नई रिसर्च ने खोला बड़ा राज
अमेरिका की यूटा यूनिवर्सिटी हेल्थ के वैज्ञानिकों ने बताया है कि शरीर में मौजूद एक फैटी मॉलिक्यूल सेरामाइड (Ceramide) किडनी सेल्स को भीतर से नुकसान पहुंचाता हैं. रिसर्च में यह पाया गया कि यदि इस सेरामाइड को नियंत्रित किया जाए, तो किडनी का डैमेज पूरी तरह रिवर्स किया जा सकता है यानी किडनी के खराब हुए हिस्से दोबारा ठीक हो सकते है-यह दावा पहले कभी इतना स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया था.
चूहों पर असर 100% सफल
वैज्ञानिकों ने ऐसे चूहों पर टेस्ट किए जिनके शरीर में स्वाभाविक रूप से सेरामाइड बहुत कम बनता था. जब इन चूहों को तेज किडनी-स्ट्रेस की स्थिति में रखा गया, जहां सामान्य चूहों की किडनी तुरंत खराब हो जाती तो इन चूहों की किडनी पर कोई असर नहीं हुआ. यह वैज्ञानिकों के लिए बेहद चौंकाने वाला नतीजा था.
एक नई दवा ने भी किया कमाल
रिसर्च में Centaurus Therapeutics* की एक नई दवा का भी परीक्षण हुआ. चूहों को पहले यह दवा दी गई, फिर किडनी पर अत्यधिक दबाव डाला गया. लेकिन नतीजा वही किडनी बिना किसी नुकसान के सुचारू रूप से काम करती दिखी. माइक्रोस्कोपिक जांच में भी कोई डैमेज नहीं मिला यानी दवा ने किडनी को पहले से सुरक्षित कर दिया.
सेरामाइड कैसे करता है नुकसान?
शरीर में जब सेरामाइड की मात्रा बढ़ जाती है, तो यह सीधे किडनी सेल्स के माइटोकॉन्ड्रिया यानी सेल्स को ऊर्जा देने वाले पावर हाउस पर हमला करने लगता हैं. ज्यादा सेरामाइड माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना को बिगाड़ देता है, जिससे उनका आकार, संतुलन और ऊर्जा बनाने की क्षमता कमजोर होने लगती हैं. जैसे ही माइटोकॉन्ड्रिया ठीक से काम नहीं कर पाते, किडनी सेल्स को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलती और वे तेजी से स्ट्रेस या चोट का शिकार होने लगते हैं. यही कारण है कि किडनी में डैमेज जल्दी बढ़ता जाता है लेकिन जब वैज्ञानिकों ने सेरामाइड के स्तर को नियंत्रित किया, तो माइटोकॉन्ड्रिया फिर से अपनी सामान्य स्थिति में लौट आए और ऊर्जा उत्पादन सुचारू रूप से होने लगा. इससे किडनी सेल्स मजबूत रहे और किडनी को नुकसान होने से बचाया जा सका. जब वैज्ञानिकों ने सेरामाइड को रोका, तो माइटोकॉन्ड्रिया फिर से सामान्य होकर किडनी को सुरक्षित रखते रहे.
यह खोज क्यों गेम-चेंजर है?
यह शोध सिर्फ बीमारी के लक्षण नियंत्रित नहीं करता, बल्कि किडनी डैमेज की जड़ पर हमला करता हैं. यह पहली स्टडी है जिसने किडनी सेल्स के माइटोकॉन्ड्रिया को सुरक्षित रखते हुए डैमेज को पूरी तरह रोकने की क्षमता साबित की हैं. अगर यह तरीका इंसानों में सफल रहा तो एक्यूट किडनी इंजरी (AKI), डायबिटिक किडनी डैमेज, हार्ट फेल्यर जैसी माइटोकॉन्ड्रियल बीमारियां जैसे सभी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता हैं.
इंसानों में कब आएगा इलाज?
यह दवा अभी प्री-क्लिनिकल स्टेज में हैं. इंसानों पर टेस्ट शुरू नहीं हुए हैं. यह भी साफ नहीं कि डैमेज हो जाने के बाद यह तरीका उतना ही असरदार होगा या नहीं. अगर अगले चरण के क्लिनिकल ट्रायल सफल हुए तो यह तकनीक दुनिया भर के करोड़ों किडनी मरीजों के लिए वरदान बन सकती हैं. यह पहली बार हो सकता है कि किडनी डैमेज को सिर्फ रोका नहीं, बल्कि पूरी तरह ठीक किया जा सके.
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