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रांची/डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित बहुप्रतीक्षित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को भारतीय-अमेरिकी कारोबारी समुदाय से व्यापक समर्थन मिला है. वहीं, नीति और व्यापार विशेषज्ञों ने इसे सकारात्मक कदम बताते हुए समझौते के विस्तृत प्रावधान सामने आने तक संयम बरतने की सलाह दी है.
वेंचर कैपिटलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी की फंडरेज़र आशा जडेजा मोटवानी ने समझौते को ट्रंप प्रशासन के भीतर पहले से अपेक्षित करार देते हुए इसे बड़ी उपलब्धि बताया. समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने कहा कि फरवरी तक किसी समझौते के संकेत मिल रहे थे, हालांकि इसका इतनी जल्दी सामने आना उनके लिए भी अप्रत्याशित रहा.
मोटवानी ने विश्वास जताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में आवश्यक बदलाव के लिए तैयार होंगे. उनके अनुसार, रूस से तेल आयात के स्थान पर अमेरिका या उसके सहयोगी देशों से ऊर्जा खरीद की दिशा में यह समझौता अहम भूमिका निभा सकता है. टैरिफ से जुड़े प्रावधानों को उन्होंने “संभवतः सबसे बेहतर नतीजा” बताया.
उन्होंने यह भी कहा कि वॉशिंगटन अब भारत को ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में एक केंद्रीय साझेदार के रूप में देख रहा है. उनके मुताबिक, द्विपक्षीय संबंध एक बार फिर मजबूत और स्थिर आधार पर लौट आए हैं और निजी क्षेत्र को इस अवसर का लाभ उठाते हुए तेजी से साझेदारियां आगे बढ़ानी चाहिए.
इसके विपरीत, अमेरिका के पूर्व सहायक वाणिज्य सचिव (ट्रेड डेवलपमेंट) रेमंड विकरी ने अधिक सतर्क दृष्टिकोण अपनाया. उन्होंने कहा कि इस समझौते का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह हाल के वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों में आई गिरावट को रोकता है. उनके अनुसार, टैरिफ, वीजा और अन्य विवादों के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा था.
विकरी ने टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने का स्वागत किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इसके दायरे और प्रभाव से जुड़े कई अहम विवरण अभी स्पष्ट नहीं हैं. उन्होंने विशेष रूप से कृषि, डेयरी, दालों और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भारत द्वारा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं हटाने के दावों पर सवाल उठाए.
उन्होंने प्रशासन द्वारा बताए गए व्यापारिक आंकड़ों पर भी संदेह जताया. उनके मुताबिक, 500 अरब डॉलर की अतिरिक्त खरीद का दावा असाधारण प्रतीत होता है, खासकर तब जब मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार लगभग 200 अरब डॉलर के स्तर पर है.
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) में इंडिया और इमर्जिंग एशिया इकोनॉमिक्स के चेयर रिक रॉसो ने कहा कि यह समझौता ऐसे समय आया है, जब ऊंचे टैरिफ के बावजूद भारत-अमेरिका व्यापार उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. उन्होंने बताया कि फार्मास्यूटिकल्स जैसे कुछ क्षेत्रों को मिली छूट के कारण पिछले वर्ष द्विपक्षीय व्यापार में करीब 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.
हालांकि, रॉसो ने वर्ष के अंतिम महीनों में व्यापारिक रफ्तार में संभावित सुस्ती की ओर इशारा किया और चेतावनी दी कि यदि अमेरिका आगे नहीं बढ़ा तो भारत अन्य देशों के साथ समझौते कर सकता है. उन्होंने मौजूदा घोषणा को संभावित “पहला चरण” बताते हुए कहा कि इससे भारत में बाजार पहुंच बेहतर होगी और अमेरिकी आयात पर टैरिफ सामान्य स्तर पर लौटने की राह बनेगी.
ओहायो से रिपब्लिकन नेता नीरज अंतानी ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे भारत-अमेरिका संबंधों के लिए निर्णायक कदम बताया. उन्होंने कहा कि टैरिफ में पारस्परिक कटौती और भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद रोकने का फैसला दोनों देशों के हित में है. उनके अनुसार, यह समझौता उस लंबे गतिरोध को समाप्त करता है, जिसे पिछली सरकारें सुलझा नहीं सकीं.
भारतीय-अमेरिकी उद्यमी योगी चुघ ने भी इस समझौते को प्रवासी कारोबारी समुदाय के लिए एक अहम मोड़ बताया. उन्होंने कहा कि यह वैश्विक प्रतिस्पर्धा के तेज होते दौर में विश्वास बढ़ाने वाला रणनीतिक कदम है. गौरतलब है कि भारत और अमेरिका पिछले कई वर्षों से एक व्यापक व्यापार ढांचे पर सहमति बनाने का प्रयास कर रहे थे. टैरिफ विवादों, बाजार पहुंच के मुद्दों और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ता रहा और 200 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
यह घोषणा ऐसे समय पर हुई है, जब दोनों देश ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकियों जैसे व्यापक रणनीतिक लक्ष्यों के साथ आर्थिक सहयोग को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. समझौते का पूरा विवरण जारी होने के बाद इसके प्रभाव को लेकर और स्पष्टता आने की उम्मीद है.
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