गढ़वा जिले की एक ऐसी जनप्रतिनिधि जो खुद कहती हैं उसे नहीं चाहिए वह कुर्सी जो बनी है दूसरों के लिए

गढ़वा जिले की एक ऐसी जनप्रतिनिधि जो खुद कहती हैं उसे नहीं चाहिए वह कुर्सी जो बनी है दूसरों के लिए

गढ़वा जिले की एक ऐसी जनप्रतिनिधि जो खुद कहती हैं उसे नहीं चाहिए वह कुर्सी जो बनी है दूसरों के लिए

अरुण कुमार यादव/न्यूज11  भारत

गढ़वा/डेस्क:   गढ़वा जिले के रंका प्रखंड के उप प्रमुख अनुभा सिंह लगभग एक वर्षों तक प्रभारी प्रखंड प्रमुख का संभाला पदभार, पुनः चुनाव के बाद नवनिर्वाचित प्रखंड प्रमुख लीलावती देवी को शौपा प्रमुख पद, प्रखंड प्रमुख का पद न केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी का प्रतीक है, बल्कि जनता की आकांक्षाओं,विकास और संवेदनशील नेतृत्व का भी प्रतीक है. सामान्यतः यह देखा जाता है कि इस पद को पाने की लालसा में लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं, पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव की चाह कई बार मूल्यों पर भारी पड़ जाती है. लेकिन झारखंड के गढ़वा जिले के रंका प्रखंड में वर्तमान समय में एक ऐसी शख्सियत कार्यरत हैं, जिन्होंने इस धारणा को पूरी तरह बदल कर रख दिया है..

जी हाँ हम बात कर रहे हैं रंका प्रखंड के प्रभारी प्रमुख के रूप में रहीं रंका गढ़ के अनुभा सिंह की जो अनुभा सिंह ने अपने कार्यकाल में कभी भी पद की गरिमा को रुतबे या अहंकार का माध्यम नहीं बनाया. उनका स्पष्ट मानना है कि जो व्यक्ति वास्तव में काम करना चाहता है, उसके लिए पद का नाम या कुर्सी मायने नहीं रखती. सेवा भाव,संवेदनशीलता और जिम्मेदारी ही किसी भी जनप्रतिनिधि की असली पहचान होती है. यही कारण है कि उन्होंने कभी भी अपना पद उप प्रमुख के अलावा प्रखंड प्रमुख होने की लालसा नहीं दिखाई और न ही इस पद को लेकर किसी प्रकार का दिखावा किया.

वे एक प्रतिष्ठित राजघराने से संबंध रखती हैं और रंका गढ़ के रॉयल परिवार की सदस्य हैं. इसके बावजूद उनके व्यवहार में कहीं भी शानो-शौकत या अभिजात्य वर्ग का अहंकार नहीं झलकता. इसके विपरीत, वे आम जनता के बीच एक सरल, सहज और संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में जानी जाती हैं. बताते चलें कि वे झारखंड के पूर्व बाल श्रम आयोग के चेयरमैन दिलीप सिंह के धर्मपत्नी भी हैं, जिससे सामाजिक सरोकार और सेवा की भावना उन्हें विरासत में मिली है.

अपने वक्तव्यों में अनुभा सिंह अक्सर कहती हैं कि “पद की लोलुपता इंसान को नीचे गिराती है.” उनके अनुसार, जब व्यक्ति पद के पीछे भागने लगता है, तब वह अपने मूल उद्देश्य जनसेवा से भटक जाता है. इसी सोच के साथ उन्होंने हमेशा पद को साधन माना, साध्य नहीं. यही कारण है कि रंका प्रखंड के प्रमुख पद आदिवासी के लिए आरक्षित है जहाँ किसी मामले में पूर्व प्रखंड प्रमुख हेमंत लकड़ा के जेल जाने के बाद से रंका प्रखंड प्रमुख का प्रभार वर्तमान उप प्रमुख अनुभा सिंह को मिली तब से लेकर अब तक वह कुर्सी का उपयोग नहीं किया.

वहीं अनुभा सिंह बताती हैं की लगातार बस एक ही मन में सोच रहीं थी की किसी तरह से जिनके लिए आरक्षित है रंका प्रखंड प्रमुख का कुर्सी उन्हें मिल जाए, वहीं प्रखंड प्रमुख प्रभारी होने के बावजूद कभी भी अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया और न ही स्वयं को किसी से ऊपर समझा. कुछ ही दीन पहले पुनः पंचायत समिति सदस्यों के द्वारा प्रखंड प्रमुख का चुनाव संपन्न होने के बाद से वे लगातार प्रशासनिक अधिकारियों से यह आग्रह करती आ रही हैं कि जितनी जल्दी हो सके, निर्वाचित प्रमुख को विधिवत पदभार सौंप दिया जाए. वे इस बात को लेकर कभी नहीं थकतीं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए और जिसे जनता ने चुना है, वही इस पद की जिम्मेदारी संभाले. यह सोच उनके लोकतांत्रिक मूल्यों और निष्ठा को दर्शाती है.

अनुभा सिंह का यह व्यवहार आज के राजनीतिक और प्रशासनिक माहौल में एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है. वहीं वे स्वयं पदभार सौंपने की पहल करती नजर आई. इससे न केवल उनकी नैतिक ऊंचाई का पता चलता है, बल्कि यह भी स्पष्ट होता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो सत्ता से नहीं, बल्कि सेवा से प्रेरित हो.

रंका प्रखंड में उनके कार्यकाल को लोग सम्मान और विश्वास के साथ याद कर रहे हैं. उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि बिना किसी लालसा और दिखावे के भी प्रभावी कार्य किया जा सकता है. अनुभा सिंह का व्यक्तित्व उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो राजनीति और जनसेवा को केवल पद और प्रतिष्ठा तक सीमित मानते हैं. उनके विचार और आचरण यह संदेश देते हैं कि पद नहीं, बल्कि कर्म ही व्यक्ति को महान बनाता हैं.

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