रांची/डेस्क:
न्यूज11 भारत: भारतीय लोकतंत्र में चुनाव एक बहुत बड़ा राजनीतिक समर है. आज यह समर ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां से हर पार्टी, हर गठबंधन एक ही रास्ता पकड़ना चाहते हैं जो जीत की ओर ले जाये. यह अनुचित भी नहीं है, लेकिन अब इस समर को जीतने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने के लिए हर पार्टी तैयार रहती है और इसे वह अनुचित नहीं समझती. इसका जीता-जागता प्रमाण है Association for Democratic Reforms (ADR) की रिपोर्ट. एडीआर हर चुनाव से पहले उम्मीदवारों का पूरा कच्चा-चिट्ठा आंकड़ों के साथ जारी करता है. ये वे आंकड़े होते हैं जो हर मतदाता अपने नामांकन के समय शपथपत्र के रूप में जमा करते हैं. इन आंकड़ों में उनकी सम्पत्ति के ब्यौरे के साथ उन पर दर्ज आपराधिक मामले भी शामिल होते हैं. नामांकन करने वालों को यह हलफनामा देते हुए कोई शर्म भले न महसूस हो, लेकिन मतदाताओं का सिर जरूर शर्म से झुक जाता है कि आखिर उन्हें इन्हीं 'महानुभावों' में से किसी को अपना 'माननीय' चुनना है.
एडीआर के आंकड़े बेहद चिंताजनक
बिहार विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण का मतदान 6 नवम्बर को है. इससे पहले ADR इस चरण के 1,314 उम्मीदवारों की सम्पत्ति के आंकड़ों के साथ उनके आपराधिक रिकॉर्ड का भी ब्यौरा प्रस्तुत किया है. एडीआर की यह रिपोर्ट बताती है कि कुल दर्ज आपराधिक मामलों में 27% पर गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार जैसे संगीन मामले हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक पहलू तो यह है कि इनमें CPM के तो सभी (100%) उम्मीदवारों पर गंभीर आरोप हैं.
एक नजर पार्टी वार दर्ज आपराधिक मामले
बिहार चुनाव के पहले चरण में 1,314 उम्मीदवार चुनाव मैदान में है. एडीआर ने इनमें से 1,303 उम्मीदवारों के शपथपत्रों का विश्लेषण किया है। इनमें 423 (32%) उम्मीदवारों ने अपने नामांकन में स्वीकार किया है कि उन पर आपराधिक मामले दर्ज है, जबकि 354 (27%) उम्मीदवारों पर तो गंभीर आपराधिक आरोप हैं। राजनीतिक शुचिता के नाम पर बनायी गयी प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी इससे अछूती नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार दर्ज आपराधिक मामले-
- CPM -100 %
- CPI - 80 %
- CPI (ML) - 64%
- RJD - 60%
- BJP 56%
- कांग्रेस - 52%
- जन सुराज - 43%
- AAP - 20%
मतदाताओं के सामने चुनाव की चुनौती
पार्टियों ने अपना लाभ-हानि देखते हुए उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में खड़ा कर दिया है. लेकिन असल परेशानी तो मतदाताओं के सामने हैं. मतदाताओं को पता होता है कि चुनाव में जो भी उम्मीदवार खड़ा या खड़े हैं, उन पर आपराधिक मामले दर्ज है. लेकिन भारतीय लोकतंत्र में मतदाताओं की यह विवशता है कि उसे इन्हीं में से अपना जनप्रतिनिधि चुनना है. इस समस्या के लिए चुनावी प्रक्रिया सवाल तो उठा सकते हैं, लेकिन इसका समाधान दिखाई नहीं देता. कहने तो चुनाव आयोग ने मतदाताओं को लिए NOTA की व्यवस्था कर रखी है, लेकिन NOTA पर पड़ने वाले वोटों का प्रतिशत ही बताता है कि मतदाता अपने प्रत्याशियों के प्रति कितने गंभीर हैं. वैसे जनता की जागरूकता को लेकर कोई सवाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि देश की जनता कितनी जागरूक है, यह सबको पता है. पर एक सवाल है जिसका जवाब अभी तक खुद चुनाव आयोग भी नहीं दे पाया है कि अगर किसी चुनाव में NOTA का प्रतिशत सबसे ऊपर हो जाये इस स्थिति में होगा क्या। ADR और SWEEP मतदाताओं को जागरूक करन के लिए कई अभियान चलाते हैं, कैम्पेन करते हैं, लेकिन सच कहा जाये तो इन अभियान का असर अब तो नहीं दिखा है और आने वाले वर्षों में भी दिखने की उम्मीद कम ही है.
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