न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
पटना- महज 20 दिन पहले तक निशांत कुमार राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी लेने से बचते नजर आ रहे थे। उपमुख्यमंत्री पद की चर्चाओं पर उन्होंने खुद को “अभी राजनीति के लिए परिपक्व नहीं” बताते हुए किसी भी पद को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। लेकिन बेहद कम समय में परिस्थितियां बदलीं और अब उन्हें सीधे मंत्री पद की जिम्मेदारी दे दी गई। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन 20 दिनों में ऐसा क्या बदला, जिसने जेडीयू नेतृत्व को निशांत कुमार पर भरोसा जताने के लिए प्रेरित किया।
दरअसल, जेडीयू कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से निशांत कुमार को सक्रिय राजनीति में लाने और उन्हें बड़ी भूमिका देने की मांग उठती रही है। कई मौकों पर उन्हें उपमुख्यमंत्री या भविष्य के मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर भी पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन निशांत लगातार इससे दूरी बनाते रहे। अब उनके मंत्री बनने को सिर्फ कैबिनेट विस्तार नहीं, बल्कि जेडीयू की भविष्य की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
निशांत पर रोहिणी आचार्य का तंज
निशांत कुमार के मंत्री बनने पर राजद नेता रोहणी आचार्य ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा- “बिना चुनाव लड़े चोर दरवाजे से मंत्रिमंडल में शॉर्टकट एंट्री पाने के लिए भाई निशांत को बधाई। शुभकामनाएं… और यह एंट्री दिलाने के लिए ‘स्वयंभू नैतिक पुरुष’ चाचा जी को भी ढेरों बधाई। 2005 से पहले ई सब भी नहीं होता था चाचा रंगबदलू जी…”
रोहिणी के इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरु हो गई है। विपक्ष इसे परिवारवाद और बैकडोर एंट्री बता रहा है, जबकि जेडीयू इसे संगठन और नेतृत्व के स्वाभाविक विस्तार के रूप में पेश कर रही है।
निशांत की असली अग्निपरीक्षा अब शुरु
निशांत कुमार को राजनीति में सक्रिय करने की चर्चाएं पहले से चल रही थीं, लेकिन 5 दिवसीय सद्भाव यात्रा के दौरान उन्हें सीधे मंत्री बनाए जाने ने यह साफ कर दिया कि पार्टी अब नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के मूड में है। हालांकि, उनके सामने अब सबसे बड़ी संवैधानिक चुनौती भी खड़ी है।
फिलहाल निशांत कुमार न तो बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के। संविधान के अनुसार मंत्री बनने के बाद उन्हें छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होगा। यदि वह तय समय सीमा के भीतर सदस्यता हासिल नहीं कर पाए, तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।
अब तक सार्वजनिक और चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखने वाले निशांत कुमार के लिए यह दौर किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं माना जा रहा। पिता नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे पीछे हटने की चर्चाओं के बीच निशांत की एंट्री को जेडीयू के नेतृत्व परिवर्तन और भविष्य की तैयारी के संकेत के रुप में देखा जा रहा है।
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