रेप पीड़िताओं के लिए झारखंड हाईकोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला, Two-Finger Test पर लगाया पूर्ण प्रतिबंध

रेप पीड़िताओं के लिए झारखंड हाईकोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला, Two-Finger Test पर लगाया पूर्ण प्रतिबंध

रेप पीड़िताओं के लिए झारखंड हाईकोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला two-finger test पर लगाया पूर्ण प्रतिबंध

न्यूज11 भारत
रांची/डेस्क:
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में झारखंड हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए रेप और POCSO मामलों की जांच, पीड़ितों की सुरक्षा तथा न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं. हाई कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायाधीश राजेश शंकर शामिल थे, ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करते हुए पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा पर विशेष जोर दिया. 

रेप मामलों में प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जाए
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि रेप मामलों में प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जाए, जबकि पूरी जांच अधिकतम दो महीने के अंदर समाप्त करना अनिवार्य होगा. अदालत ने कहा कि पीड़िताओं को तुरंत कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए और FIR दर्ज होने के बाद उनकी सुरक्षा, आश्रय तथा आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए. POCSO मामलों में अदालत ने 24 घंटे के भीतर पीड़ित बच्चों की देखभाल और सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. साथ ही, पीड़िता का बयान महिला अधिकारी द्वारा दर्ज किए जाने और पूरी जांच प्रक्रिया को संवेदनशील एवं पीड़िता-केंद्रित तरीके से संचालित करने पर जोर दिया गया है.

Two-Finger Test पर पूरी तरह रोक   
हाईकोर्ट ने विवादित "टू-फिंगर टेस्ट" (Two-Finger Test) पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक करार दिया. अदालत ने ऐसे परीक्षण करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं तथा राज्य सरकार को सभी अस्पतालों में इस पर प्रभावी रोक लागू करने को कहा है. फैसले में डॉक्टरों और पुलिस अधिकारियों को संवेदनशीलता एवं कानूनी प्रक्रियाओं से संबंधित विशेष प्रशिक्षण देने की आवश्यकता भी बताई गई है. इसके अलावा, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ाने पर बल देते हुए स्कूलों, कॉलेजों और गांव स्तर पर व्यापक अभियान चलाने का सुझाव दिया गया है. अदालत ने लड़कियों के लिए सेल्फ-डिफेंस प्रशिक्षण को भी आवश्यक बताया.

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा सर्वोपरि है तथा ऐसे मामलों में राज्य की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए. अदालत के इस फैसले को महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम माना जा रहा है.

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