आशिष शास्त्री/न्यूज11 भारत
सिमडेगा/डेस्क: अक्सर तरक्की और विकास के नाम पर पहाड़ों का सीना चीरकर ठेकेदार मुनाफा समेट निकल जाते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं प्रकृति के गहरे जख्म. लेकिन सिमडेगा जिले के कोलेबिरा के जामटोली से आई इस तस्वीर को न्यू यॉर्क टाइम्स और बीबीसी के फ्रंट पेज पर होना चाहिए.
सोचिए एक ऐसी सूखी-बीरान चट्टान, जहाँ पानी की एक बूंद ठहरना नामुमकिन. वहां पहले बाहर से ट्रैक्टर भर-भरकर मिट्टी लाई गई. पत्थरों के गड्ढों को मिट्टी से भरा गया और फिर शुरू हुआ कुदरत का रीबूट बटन दबा कर पुनः हरियाली लाने का खेल. जिले के मौसम का मिजाज भी ऐसा था मानो आसमान खुद इस पहल का इम्तिहान ले रहा हो. मूसलाधार बारिश, पैरों के नीचे पिघलती हुई कीचड़ वाली ढलान. लेकिन क्या मजाल कि कोई पीछे हट जाए. जिले की कमान संभाल रहीं उपायुक्त कंचन सिंह और डीएफओ शशांक शेखर सिंह हाथ में छाता ताने उस चोटी पर ऐसे चढ़ रहे थे. मानो एवरेस्ट फतह करने निकले हों. उनके पीछे अफ़सरों का काफिला था और साथ में थे वो स्कूली बच्चे जो दुनिया को यह बताने निकले थे कि तुमने पहाड़ खोदे हैं तो हम उन्हें वापस हरा-भरा बनाकर ही दम लेंगे. डीसी कंचन सिंह ने न सिर्फ पौधे लगाए बल्कि उन पौधों को बचाने का जिम्मा मुखिया अंजना लकड़ा को सौंपते हुए सतत निगरानी का आदेश दिया.
साथ ही खनन पदाधिकारी को तुरंत घेराबंदी करने का भी निर्देश देकर यह साफ कर दिया कि प्रशासन यहाँ सिर्फ फोटो खिंचवाने नहीं आया है बल्कि एक मुकम्मल ग्रीन ज़ोन विकसित करने का विज़न लेकर आया है.
इसलिए भी बेहद खास है यह पहल
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा इंटरनेशनल मैसेज प्रशासनिक जुगलबंदी है. पूरी दुनिया में खनन और वन विभाग का रिश्ता को वैसा ही समझा जाता है जैसा भारत में सास और बहू का रिश्ता. इन दोनों विभागों में से एक का काम है उजाड़ना, तो दूसरे का बचाना. दोनों हमेशा एक-दूसरे के पूरक रहते हैं. लेकिन सिमडेगा में इन दोनों विभागों ने जो फेविकॉल का जोड़ दिखाया, उसने सस्टेनेबल डेवलपमेंट की नई परिभाषा लिख दी. यह पहल इस बात का शंखनाद है कि विकास की वेदी पर पर्यावरण की बलि नहीं दी जा सकती. अगर हमने अपनी ज़रूरतों के लिए पहाड़ का सीना चीरा है तो उसे वापस हरा-भरा करना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है. सिमडेगा डीसी, वन विभाग और खनन विभाग की यह जुगलबंदी देश के हर उस जिले के लिए एक गाइडबुक है, जहाँ खनन ने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा है.
प्रशासनिक इच्छाशक्ति के आगे नतमस्तक हुआ मौसम
अमूमन सरकारी योजनाएं फाइलों में और मौसम के मिजाज को देखकर तय होती हैं. लेकिन सोमवार को जामटोली की चोटी पर कुछ और ही नज़ारा था. सुबह से ही मूसलाधार बारिश के कारण जहाँ सड़कों पर आवाजाही काफी कम दिखी. वहीं उपायुक्त कंचन सिंह और डीएफओ शशांक शेखर सिंह के इरादे उस पहाड़ की चट्टानों से भी ज़्यादा मजबूत दिखे. हाथों में छाता थामे, कीचड़ और पानी की परवाह किए बिना जब जिले के आला अधिकारी, जनप्रतिनिधि और स्कूली बच्चे उस वीरान पहाड़ी पर चढ़े तो ऐसा लगा मानो प्रशासनिक अमला मूसलाधार बारिश के बीच प्रकृति से कोई कामना करने अथवा क्षमा मांगने पहुंचा हो.
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