मुमताज अहमद/न्यूज़11 भारत
खलारी/डेस्क: सार्वजनिक स्वच्छता, यात्री सुविधा और स्वच्छ भारत अभियान के उद्देश्यों को धरातल पर उतारने के लिए कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) द्वारा सामाजिक दायित्व योजना (सीएसआर) के तहत खलारी रेलवे स्टेशन एवं मैक्लुस्कीगंज रेलवे स्टेशन पर लाखों रुपये की लागत से शौचालयों का निर्माण कराया गया था. लेकिन यह महत्वाकांक्षी योजना आज प्रशासनिक उदासीनता, जिम्मेदारी के अभाव और आपसी तालमेल की कमी के कारण “हाथी दांत” साबित हो रही है. वर्षों पहले पूरा हो चुका यह निर्माण कार्य आज उद्घाटन के बिना ही जर्जर हालत में खड़ा है और यात्रियों के लिए सुविधा बनने के बजाय समस्या का कारण बन चुका है.
खलारी रेलवे स्टेशन, जहां प्रतिदिन सैकड़ों यात्री आवागमन करते हैं, वहां सीसीएल द्वारा दो अलग-अलग स्थानों पर शौचालयों का निर्माण कराया गया था. हैरानी की बात यह है कि एक शौचालय आज भी उद्घाटन की प्रतीक्षा कर रहा है, जबकि दूसरा लंबे समय से बंद पड़ा है. नियमित संचालन और रखरखाव के अभाव में ये शौचालय धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो चुके हैं. महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांग यात्रियों को शौचालय न होने के कारण भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. मजबूरी में यात्रियों को खुले में जाने या स्टेशन परिसर से बाहर विकल्प तलाशने पड़ते हैं, जिससे न केवल असुविधा बढ़ती है बल्कि सुरक्षा और स्वच्छता दोनों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
मैक्लुस्कीगंज रेलवे स्टेशन की स्थिति भी इससे अलग नहीं है. यहां सीसीएल के सीएसआर मद से निर्मित शौचालय रखरखाव के अभाव में पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं. सूत्रों के अनुसार, कई बार स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों द्वारा पत्राचार और अनुरोध किए गए, लेकिन सीसीएल प्रबंधन की ओर से शौचालयों को रेलवे को विधिवत हैंडओवर नहीं किया गया. हैंडओवर न होने के कारण यह स्पष्ट नहीं हो सका कि इनके संचालन और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है. परिणामस्वरूप असामाजिक तत्वों ने शौचालयों को निशाना बनाते हुए नल, पाइप, दरवाजे और अन्य कीमती सामान चोरी कर लिए.
स्थिति को और गंभीर बनाता है रेलवे स्टेशन विस्तार का प्रस्ताव. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो संभव है कि स्टेशन विस्तार की आड़ में इन शौचालयों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाए. ऐसा होने पर लाखों रुपये की लागत से बनी सार्वजनिक सुविधा नष्ट हो जाएगी और यह सीएसआर के नाम पर हुए सरकारी धन के दुरुपयोग का एक और उदाहरण बनकर रह जाएगा.
स्थानीय नागरिकों और राहगीरों का आरोप है कि पंचायत प्रतिनिधि, रेलवे पदाधिकारी और सीसीएल प्रबंधन अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेरते नजर आ रहे हैं. आम लोगों का कहना है कि जहां पंचायत प्रतिनिधियों और अधिकारियों को व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ की संभावना दिखती है, वहां पूरी शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जहां कोई सीधा लाभ नहीं, वहां हस्तक्षेप करने से कतराया जाता है. इसी मानसिकता के कारण विकास कार्य कागजों में तो पूरे हो जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर वे खंडहर में तब्दील हो जाते हैं और उनकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं होता.
सूत्रों के मुताबिक, शौचालय निर्माण कार्य को पूर्ण हुए कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो सका कि इनका संचालन और रखरखाव कौन करेगा. न पंचायत प्रतिनिधि आगे आ रहे हैं, न रेलवे प्रशासन और न ही सीसीएल प्रबंधन स्पष्ट जिम्मेदारी लेने को तैयार है. इस आपसी खींचतान का खामियाजा आम यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है.
अब यात्रियों और स्थानीय लोगों की एक स्वर में मांग है कि सीसीएल अविलंब इन शौचालयों का विधिवत हैंडओवर रेलवे प्रशासन को करे या स्वयं इनके संचालन, सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी ले. वहीं रेलवे प्रशासन से भी अपेक्षा की जा रही है कि स्टेशन विस्तार योजना के तहत इन शौचालयों को संरक्षित रखते हुए शीघ्र चालू कराया जाए. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह मामला न केवल प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बनेगा, बल्कि स्वच्छ भारत और सीएसआर जैसे जनकल्याणकारी अभियानों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है एवं पंचायत प्रतिनिधियों की उपलब्धियां को भी बयां कर रहा है.