आशीष शास्त्री/न्यूज़11 भारत
सिमडेगा/डेस्क: झारखंड के आदिवासी बहुल जिलों में सुमार सिमडेगा जिला भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम, उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को जीवंत अपनी संस्कृति में शामिल कर रखा है. महात्मा गांधी के नाम पर यहां विगत 75 वर्षों से गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य पर विशाल गांधी मेला लगता आ रहा है. गांधी मेला एक तरफ सामाजिक समरसता का एक बेजोड़ उदाहरण पेश करता है तो दूसरी ओर मेला स्वदेशी रंग व खुशबू के रूप में बापू के स्वराज की परिकल्पना को भी साकार करता है.
हरेक वर्ष करीब एक सप्ताह तक चलने वाले इस गांधी मेला में जिले के साथ-साथ निकटवर्ती जिले व पड़ोसी राज्य ओडिशा, छत्तीसगढ़ से लाखों की संख्या में लोग पहुंचते है. मेले में एक ओर पारंपरिक आदिवासी संस्कृति की झलक मिलती है तो दूसरी ओर स्वदेशी निर्मित खाद्य सामग्री एवं परिधान भी मिलते है. इसके अलावा हस्त निर्मित सामग्री, उत्कृष्ट दर्जे के कृषि उत्पाद, दैनिक जरूरत की वस्तुओं के भी स्टॉल सजाए जाते है. मेला का शुभारंभ भी विधिवत राष्ट्रीय ध्वज फहराकर किया जाता है.
गांधी विकास मेला सह प्रदर्शनी में प्रत्येक वर्ष जिले के किसान बड़ी उत्साह के साथ भाग लेते है. किसान अपने बेहतर कृषि उत्पाद को प्रदर्शनी में लगाते है. मेला की समाप्ति के मौके पर बेहतर उत्पाद के लिए किसानों को पुरस्कृत किया जाता है. इधर मौके पर विभिन्न विभागों के द्वारा स्टॉल लगाए जाते है. जहां विभिन्न प्रकार के योजनाओं के बारे में लोगों को जानकारी दी जाती है. वहीं स्वरोजगार से जुड़ीं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं भी आचार, मुरब्बा, हैंडक्रॉफ्ट आदि सामग्री की स्टॉल इस मेला में लगाती है. इसके अलावा यहां राजस्थान के बीकानेर से खास तरह के खाजे की दुकान भी पंहुचती है. तरह तरह के झुले और खेल तमाशे मेला के खास आकर्षण बनते है.
इस गांधी मेला इतिहास भी बेहद रोचक व प्रेरणादायी रहा है. 15 अगस्त सन् 1947 जब देश को आजादी मिली थी तब यहां बीरू गढ़ के राजा धर्मजीत सिंह देव ने गांधी मैदान में तिरंगा ध्वज फहराया था. उस ऐतिहासिक मौके पर ध्वजारोहण के बाद वंदे मातरम गाया गया था. इसी मौके पर राजा धर्मजीत सिंह देव ने धनुष पर तीर चढ़ाकर चलाया. तीर जहां जाकर मिट्टी में धंसी वहां तक की भूमि उन्होंने महात्मा गांधी के नाम पर दान कर दी, जिसका नाम गांधी मैदान रखा गया. मौके पर तत्कालीन एसडीओ एस के चक्रवर्ती, स्वतंत्रता सेनानी गंगा विष्णु रोहिल्ला, आचार्य रमापति शास्त्री, वकील रऊफ साहब, संत मेरिज विद्यालय के प्राचार्य फादर हेनरी ग्रिस्ट आदि शामिल हुए थे.
वहीं जब देश में पहला गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 1950 को मनाया गया तब इस गांधी मैदान में गांधी मेला का आयोजन शुरू हो गया. आरंभ में गांधी जी की प्रतिमा माटी से बनाई गई थी,वैसे अब यहां पाषाण प्रतिमा बनाई गई है. 31 जनवरी 1993 में यहां गांधी प्रतिमा चबूतरा निर्माण का आधार शिला रखा गया. ठीक एक साल बाद 26 जनवरी 1994 में प्रमुख टिकैत धनुर्जय सिंह देव एवं तत्कालिन एसडीओ प्रत्यय अमृत ने प्रतिमा का उद्घाटन किया. इसके बाद 2016 में तत्कालीन उपायुक्त विजय कुमार सिंह ने चबूतरा सौंदर्यीकरण व गेट आदि बनवाए.
यह गांधी मेला राज्य के दुसरे सबसे बडे मेला के रूप में अपनी पहचान रखती है. इस तरह का सांस्कृतिक, ऐतिहासिक मेला शायद ही कहीं लगता है. मेला के लिए नगर परिषद् के माध्यम से डाक बंदोबस्ती की जाती है. वर्ष 2026 में इस मेला की बंदोबस्ती 5261500 रुपए में हुई है. यह मेला 26 जनवरी से 31 जनवरी तक हीं चलता है. नगर परिषद की बंदोबस्ती डाक भी 31 जनवरी तक के लिए होती है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से संवेदक मनमानी करते हुए मेला को 06 फरवरी तक चलता है. इस दिशा में जिला प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि मेला अवधि में शहर में आवागमन प्रभावित होती है.
लोगों का मानना है कि इस तरह गांधी मेला के बंदोबस्ती की रकम बढती जाएगी और संवेदक मनमानी करेगा तो सिमडेगा की संस्कृति से जुड़े इस मेला का अस्तित्व संकट में आ जाएगा. लोगों का कहना है कि संस्कृति से जुड़े ऐसे मेले को टैक्स फ्री किया जाना चाहिए. जिससे की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके.
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