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रांची/डेस्क: झारखंड में लंबे समय से लंबित लैंड सर्वे से जुड़े गोकुलचंद जनहित याचिका मामले में हाई कोर्ट ने एक बार फिर राज्य सरकार के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई है. मंगलवार को हुई सुनवाई में सरकार की ओर से संबंधित विभाग के सेक्रेटरी ने हलफनामा दाखिल किया, लेकिन उसमें सर्वे कार्य पूरा करने की स्पष्ट समयसीमा नहीं बताने पर मुख्य न्यायाधीश एम एस सोनक और न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ ने असंतोष व्यक्त करते हुए सरकार की मंशा (इंटेंट) पर सवाल खड़े किए.
पिछली सुनवाई और कोर्ट के निर्देश
पिछली सुनवाई में हाई कोर्ट ने 17 जून 2025 के अपने आदेश का हवाला देते हुए सचिव को निर्देश दिया था कि वे हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि भूमि सर्वे के लिए कौन-सी तकनीक का उपयोग किया जाएगा और पूरी प्रक्रिया कब तक पूरी होगी. हालांकि तय समयसीमा तक यह हलफनामा दाखिल नहीं किया गया था. इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि 50 वर्षों के बाद भी सर्वे पूरा न होना बेहद चिंताजनक स्थिति है.
बाद में 25 तारीख को एक हलफनामा दाखिल किया गया, लेकिन वह सचिव की बजाय अंडर सेक्रेटरी, लैंड एक्विजिशन विभाग की ओर से था. इस पर कोर्ट ने सख्त आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया था कि जब निर्देश सचिव को दिया गया है, तो वही हलफनामा दाखिल करेंगे और किसी अन्य अधिकारी का हलफनामा स्वीकार्य नहीं होगा. इसके बाद अदालत ने 15 जुलाई तक सचिव को स्वयं नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था.
आज की सुनवाई में क्या हुआ
मंगलवार को हुई सुनवाई में सेक्रेटरी की ओर से हलफनामा दाखिल किया गया. इस हलफनामे में बताया गया कि फाइल मंत्रियों के पास जाने के बाद एक कमेटी का गठन किया गया है, जो तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी. इस रिपोर्ट में नई तकनीकों के उपयोग और सर्वे की प्रक्रिया को लेकर सुझाव दिए जाएंगे, जिसके आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार की जाएगी.
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “इंटेंट नहीं दिख रहा”
हालांकि हलफनामा दाखिल होने के बावजूद कोर्ट संतुष्ट नहीं दिखा. अदालत ने कहा कि सरकार किस तकनीक का इस्तेमाल करती है, इससे उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यह जरूरी है कि सर्वे को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की स्पष्ट मंशा दिखाई दे. कोर्ट ने यह भी कहा कि हलफनामे में अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किस चरण में कितना समय लगेगा और पूरी प्रक्रिया कब तक पूरी होगी.
पुराने दावों पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए प्रत्युष शौणिक्य ने यह भी बताया कि करीब दो साल पहले सरकार ने अपने हलफनामे में दावा किया था कि दो जिलों का सर्वे कार्य पूरा हो चुका है और बाकी जिलों का काम अंतिम चरण में है. इसके बाद सरकार ने टीमों को कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में नई तकनीकों का अध्ययन करने भेजने की बात कही थी. कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि अध्ययन और कमेटी गठन जैसी प्रक्रियाओं में ही इतना समय लग रहा है, तो आगे का कार्य कब तक पूरा होगा, इस पर कोई स्पष्टता क्यों नहीं है. हाई कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यह पूरी प्रक्रिया करीब पांच दशक से लंबित है और अब भी स्पष्ट रोडमैप का अभाव गंभीर चिंता का विषय है. अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय के बाद भी यदि सरकार समयसीमा तय नहीं कर पा रही है, तो यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है.
एजी ने मांगा समय, दिया भरोसा
इस बीच राज्य की ओर से पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता रोहितस्य रॉय ने अदालत से दो सप्ताह का समय देने का अनुरोध किया. उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे संबंधित विभागों और सचिव स्तर के अधिकारियों के साथ बैठक कर एक स्पष्ट टाइमलाइन तैयार करेंगे और इस पूरी प्रक्रिया की व्यक्तिगत रूप से निगरानी भी करेंगे, ताकि सर्वे कार्य को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके. मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त को निर्धारित की गई है. अदालत ने संकेत दिया है कि अगली तारीख पर सरकार को ठोस प्रगति और स्पष्ट समयसीमा के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी.