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रामगढ़/डेस्क: झारखंड राज्य के रामगढ़ जिले के पतरातु प्रखंड अंतर्गत लबगा पंचायत के एक छोटे से गाँव 'जराद' में रहने वाली ज्योति कुमारी (पति ज्ञान प्रकाश) का जीवन कभी साधारण ग्रामीण परिवेश की सीमाओं में बंधा था. पति की सीमित आय में परिवार जैसे-तैसे चल तो रही थी, लेकिन बच्चों की बढ़ती उम्र, उनकी शिक्षा की चिंता और घर की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना एक चुनौती बन गया था. इन कठिन परिस्थितियों ने ज्योती को तोड़ना चाहा, लेकिन उनके भीतर के आत्मविश्वास ने उन्हें टूटने के बजाय और मजबूत बना दिया. उन्होंने ठान लिया था कि वे केवल परिस्थितियों की मूक दर्शक बनकर नहीं रहेंगी, बल्कि अपने परिवार के लिए खुद एक सहारा बनेंगी.
ज्योती के जीवन में बदलाव की शुरुआत वर्ष 2021 के जून माह में हुई. जब झारखण्ड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के द्वारा उनके गांव में दिनांक 26-06-2017 को 'पूजा आजीविका सखी मंडल' का गठन किया गया जिसमे ज्योति कुमारी भी उस समूह की सक्रिय सदस्य बनी. समूह में जुड़ने से उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि नारी शक्ति का असली सामर्थ्य एकजुटता में है. समूह की बैठकों ने न केवल उनकी वित्तीय समझ बढ़ाई, बल्कि उन्हें वह मानसिक संबल भी दिया, जिसकी उन्हें उस समय सबसे अधिक आवश्यकता थी. उन्होंने सीखा कि एक-दूसरे के सहयोग से कैसे छोटे-छोटे बचत और ऋण के माध्यम से बड़े सपनों को साकार किया जा सकता है.
आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ज्योती ने अपना पहला बड़ा कदम तब उठाया, जब उन्होंने सिलाई मशीन खरीदने के लिए समूह से 10,000 रुपये का ऋण लिया. घर के एक छोटे से कोने में उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से कपड़े सिलने का काम शुरू किया. ज्योती के काम की फिनिशिंग और समय की पाबंदी ने जल्द ही गाँव के लोगों का दिल जीत लिया. धीरे-धीरे उनके पास ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी. काम के विस्तार और बेहतर गुणवत्ता के लिए उन्होंने समूह से दोबारा बैंक लिंकेज के माध्यम से 25000 रूपया का ऋण लिया और एक आधुनिक सिलाई मशीन खरीदी. आज, ज्योति सिलाई के साथ साथ ब्लाउज स्तर, साड़ी का फॉल और अन्य सामान भी बेचती है अब ज्योती न केवल दर्जी हैं बल्कि एक सफल उद्यमी भी बन चुकी हैं. वे प्रतिदिन 300 से 500 रुपये तक कमा लेती हैं, जिससे उनकी वार्षिक आय अब 1,00,000 रुपये के करीब पहुँच गई है.
आर्थिक स्वतंत्रता ने ज्योती के व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल दिया है. जो ज्योती कभी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों की ओर देखती थीं, आज वे अपने परिवार के वित्तीय निर्णयों में बराबरी की भागीदार हैं. उनके पति और परिवार के अन्य सदस्य अब उनकी कड़ी मेहनत का सम्मान करते हैं. सबसे बड़ी खुशी ज्योती को तब मिलती है, जब वे अपनी कमाई से अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पा रही हैं. आज उनका आत्मविश्वास उनके चेहरे पर साफ झलकता है. वे अब गाँव की अन्य महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल बन गई हैं.
ज्योती की यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती. वे अपनी वर्तमान उपलब्धियों को अपनी मंजिल नहीं, बल्कि एक शुरुआत मानती हैं. उनका सपना है कि वे अपने इस छोटे से सिलाई केंद्र को एक बड़े सिलाई और प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित करें. वे चाहती हैं कि गाँव की अन्य गरीब और जरूरतमंद महिलाएँ भी सिलाई सीखकर आत्मनिर्भर बनें और अपने पैरों पर खड़ी हों. ज्योती कहती हैं, "सफलता का असली आनंद तब है जब आप अपने साथ दूसरों को भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकें." अपनी इस पूरी यात्रा का श्रेय वे झारखण्ड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी और अपनी सखी मंडल को देती हैं, जिन्होंने उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग दिखाया.
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