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रांची/डेस्क: बड़कागांव की पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि हजारीबाग जिले में NTPC, CCL ,Adani कई ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के खिलाफ अपने संवैधानिक हक की लड़ाई लड़ रहे विस्थापितों पर प्रशासन का कहर टूट रहा है. शांतिपूर्ण धरना दे रहे ग्रामीणों के खिलाफ जिला प्रशासन और पुलिस का रवैया किसी ‘कॉर्पोरेट दलाल’ जैसा प्रतीत हो रहा है.
गंभीर कानूनी उल्लंघन और तानाशाही के प्रमाण:
उन्होंने आगे कहा कि फर्जी मुकदमे: पगार (केरेडारी) कांड संख्या 136/25 पुलिसिया अत्याचार का जीता-जागता उदाहरण है. जिस घटना में किसी को एक खरोंच तक नहीं आई, वहां पुलिस ने राजनीतिक और कॉर्पोरेट दबाव में ‘हत्या के प्रयास’ (Section 307 IPC/109 BNS) जैसी संगीन और झूठी धाराएं थोप दी हैं.
• SC के आदेशों की सरेआम धज्जियां: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Satender Kumar Antil बनाम CBI मामले में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में बिना वारंट या बिना 41A (CrPC/BNSS) के नोटिस के गिरफ्तारी नहीं की जा सकती. लेकिन हजारीबाग पुलिस और संबंधित न्यायिक दंडाधिकारी इन संवैधानिक निर्देशों की सरेआम अवहेलना कर रहे हैं.
• अवैध गिरफ्तारी और बर्बरता: कल आंदोलनकारी बिरजू महतो को बिना किसी वारंट और बिना सूचना के धरना स्थल से जबरन उठाकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. थाने में विस्थापितों के साथ मारपीट की जा रही है. क्या इस देश में अमीरों और गरीबों के लिए कानून के मापदंड अलग-अलग हैं?
हमारा सवाल और मांग:
अंबा प्रसाद ने कहा कि क्या हजारीबाग के पुलिस अधीक्षक (SP) और जिला न्यायालय के संबंधित अधिकारी माननीय सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर हैं? यदि पीड़ित ग्रामीण इन अधिकारियों के विरुद्ध ‘न्यायालय की अवमानना’ (Contempt of Court) का मामला सुप्रीम कोर्ट में दर्ज करते हैं, तो क्या उन्हें न्याय मिलेगा? मैं माननीय झारखंड उच्च न्यायालय और माननीय सर्वोच्च न्यायालय से करबद्ध प्रार्थना करती हूँ कि हजारीबाग में चल रहे इस असंवैधानिक दमन पर स्वतः संज्ञान (Suo Moto) लें. गरीबों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने के लिए कानून का दुरुपयोग बंद होना चाहिए!
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