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रांची/डेस्क: इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 'हर मां एक बच्चे को जन्म देती है मगर, कई युग बीतने के बाद कोई मां एक युग पुरुष को जन्म देती है.' 151 साल पहले ऐसा ही हुआ था. 151 साल पहले धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था. उनका जन्म झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में हुआ था. बिरसा मुंडा किसी परिचय के मोहताज नहीं है. हम सभी जानते हैं कि धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा महान स्वतंत्रता सेनानी और महान समाज सुधारक थे. आज के दिन यानि 9 जून 1900 को भगवान बिरसा मुंडा की मृत्यु रांची के जेल मोड स्थित बिरसा मुंडा जेल में हुई थी. जहां मौजूदा समय में बिरसा मुंडा पार्क के रूप में तबदील कर दिया गया है. तो चलिए जानते हैं कि एक बीहड़ पिछड़े गांव का आदिवासी बच्चा कैसे बना देशवासी का 'भगवान'?
भगवान बिरसा मुंडा का भगवान बनने की कहानी काफी मजेदार है. इसकी शुरुआत उनके गांव से शुरू हुई. बिरसा मुंडा ने प्रारंभिक शिक्षा हासिल की थी. जिस वजह से वह अपने गांव में जानकारों में गिने जाते थे. गांव पिछड़ा होने के वजह से वहां के लोग अंधविश्वासी थे. किसी भी प्रकार के घटना को दैवीय प्रकोप मानते थे. सही इलाज के जगह वह झाड़ फूंक पर अधिक भरोसा करते थे. वहीं बिरसा मुंडा पढे लिखे होने के वजह से वह जानकार थे और इन सभी चीज को अंधविश्वास मानते हैं. धीरे धीर वजह सभी को जागरूक करना शुरू कर दिए. शुरुआत में लोग उनके बात को नहीं मानना चाहते थे मगर समय के साथ जब लोगों ने उनकी बात को सुनी और समझी और उनके द्वारा बताए गए बीमारी के सही इलाज को करवाया तो, लोगो की जान हैजा, चेचक जैसे महामारी और सांप कांटने जैसे होने वाली घटना से बचने लगी. उनके सुझाव और उपाय से आदिवासियों की जान बचाने लगी. जिसके बाद लोगों को यह लगने लगा कि बिरसा मुंडा में कोई दैवीय शक्ति है और वे भगवान के रूप में धरती पर आ कर उनकी जान बचा रहे हैं. वे उन्हें ‘धरती आबा’ यानी धरती के पिता समझने लगे. फिर आदिवासी समाज के लोग उनकी भगवान की तरह पूजा करने लगे.
समय के साथ बिरसा मुंडा ने एक नए धर्म की शुरुआत की. जिस धर्म को हम सभी बिरसाइत धर्म के रूप में जानते हैं. बिरसा मुंडा आध्यात्मिक व्यक्ति थे. उन्होंने कई ग्रंथों को पढ़ रखा था. जिसमें रामायण सहित कई ग्रंथ शामिल है. आदिवासी समाज को एकजुट करने के लिए उन्होंने 1895 में बिरसाइत धर्म की शुरुआत की. इस धर्म के अनुयायियों को एक अनुशासित जीवन शैली का पालन करना होता है. उनको शराब, मांस, खैनी , बीड़ी, और किसी अन्य नशा से दूर रहना होता था. वहीं गुरुवार के दिन फूल, पत्ता और दातुन तोड़ने की धर्म को मनाने वाले को मनाही होती थी. धर्म के मनाने वालों को वस्त्र के रूप में सफेद कपड़ा पहनना होता था. इस धर्म का पालन करने वाले लोग नैतिक और धार्मिक रूप से अपने समाज के लिए प्रतिबद्ध होते थे.
वहीं अपने समाज को सुधारने और एक जुट करने के बाद बिरसा मुंडा ने एक क्रांतिकारी टीम बनाकर अंग्रेजों, जमींदारों और साहूकारों के खिलाफ साल 1899 में उलगुलान किया था. यह उलगुलान बिरसा मुंडा और आदिवासियों के तरफ से अंग्रेजों की नीतियां के खिलाफ थी. अंग्रेजों की नीतियां में आदिवासियों को जमीन और जंगल से बेदखल कर रही थीं. मुंडा समाज में जमीन के स्वामित्व की अपनी परम्परा थी. इसे खुंटकट्टी व्यवस्था कहा जाता था. खुंटकट्टी के तहत जो परिवार जंगल साफ कर खेती के लिए जमीन तैयार करता वह उसकी हो जाती. इस भूमि पर पीढ़ी दर पीढ़ी उसी के वंश का अधिकार होता था.
उलगुलान की आग ने आग तेजी पकड़ी उसके बाद अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को पकड़ने की मनसा बनाई. जब वह उनकी पकड़ में नहीं आए तो, अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए इनाम की घोषणा कर दी. जिसकी लालच में आकर बिरसा मुंडा के एक करीबी ने उनका पता बता दिया. इस गुप्त सुचना के अधार पर कार्रवाई करते हुए अंग्रेजी सेना ने उन्हें 3 मार्च 1900 को गिरफ्तार कर लिया. जिसके बाद कोर्ट में सुनवाई के दौरान अंग्रेजी कानून के हिसाब से उन्हें दो साल की सजा सुनायी गयी. अंग्रेजों का अत्याचार सहते-सहते 9 जून 1900 को जेल में ही उनकी रहस्यमयी मौत हो गयी.
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