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रांची/डेस्क: देश में एक अजब सी स्थिति उत्पन्न हो रही है. हो रही है कहने से ज्यादा यह कहना बेहतर होगा कि हो गयी है. देश में इंजीनियरों की तो बाढ़ आ गयी है, लेकिन प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन जैसे तकनीकी ज्ञान रखने वालों का घोर अभाव हो गया है. इन तकनीशियनों का घोर अभाव देश में उत्पन्न हो नयी समस्या की ओर इशारा कर रहा है. इजीनियर प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन जैसे अन्य तकनीकी ज्ञान रखने वालों पर भी निर्भर रहते हैं. जब इन्हीं का ही अभाव हो जाएगा तो फिर इंजीनियर क्या करेंगे?
एक रिपोर्ट बताती है कि प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई और नर्स जैसे तकनीकी व व्यावहारिक पेशेवरों की समस्या से देश जूझने लगा है. इस नयी समस्या ने एक नयी बहस भी छेड़ दी है कि अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले वर्षों में क्या होगा. क्योंकि देश में रियल इस्टेट इस समय अपने बूम पर है, इनको तैयार करने के लिए तो इंजीनियर मिल जा रहे हैं, लेकिन प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन की किल्लत होने लगी है. आखिर भारतीय बाजार का यह नया संकट किस ओर इशारा कर रहा है.
इस रिपोर्ट के आने के बाद विश्लेषकों का एक दूसरा वर्ग भी है, जो इसे समस्या नहीं मानता. उनका कहना है कि भारत श्रम शक्ति के मामले में काफी समृद्ध है, वह न सिर्फ अपने देश की बल्कि विश्व के दूसरे देशों को भी जरूरत पूरी करने की क्षमता रखता है. देश में इन तकनीशियनों की जो कमी दिख रही है, उसकी वजह भी बताई जा रही है. वजह यह है कि भारत में रियल इस्टेट का काम काफी बढ़ा है. इनकी आवश्यकता को पूरा करने के कारण ये काफी दिनों तक एक ही स्थान पर फंसे रहते हैं. इसलिए जब दूसरे स्थानों पर इनकी उपलब्धता नहीं हो पाती है तो समझा जाता है कि इनकी कमी हो गयी है. इसके अलावा विश्व के कई देश ऐसे हैं, जहां इंजीनियरों की तुलना में न सिर्फ इज्जत ज्यादा है, बल्कि वे इंजीनियरों की तुलना में कमाते भी ज्यादा हैं. इसलिए दूसरे देशों की ओर इनका पलायन भी बड़ा संख्या में होता है.
'समस्या है' और 'समस्या नहीं है' के बीच का अन्तर
प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन्स जैसे तकनीकी जानकारों की कमी की बात तो सामने आयी है और भारत में श्रम शक्ति की कोई कमी नहीं है, इन दोनों बातों के बीच का अन्तर भी समझना होगा. अंतर यह कि वाकई में देश में श्रम शक्ति का अभाव नहीं है, लेकिन इससे तकनीकी रूप से स्किल्ड लोगों की आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती. इसके लिए इनके पास तकनीकी ज्ञान भी होना जरूरी है. इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा 'कौशल की गुणवत्ता' है। भारत में श्रमशक्ति का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है, और इनके पास तकनीकी ज्ञान का घोर अभाव होता है. कुछ प्रतिशत लोगों के पास ही औपचारिक प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र होता है. सरकारी आंकड़े को ही सही मन लें तो हर साल एक करोड़ बीस लाख नए युवा रोजगार की तलाश में निकल रहे हैं और देश के पास सालाना सिर्फ चौंतीस लाख लोगों को प्रशिक्षित कर पाने की क्षमता है. यह स्थिति सारी सच्चाई को सामने रखने के लिए काफी है.
अब थोड़ी सी बात इंजीनियरों की कर लें. देश में हर साल जितने तकनीशियन नहीं पैदा नहीं होते उससे बड़ा तो इंजीनियरों की फौज खड़ी है. लेकिन इनकी हालत यह है कि टॉप के 10% इंजीनियरों के पास काम है और उनकी डिमांड है. देश की बड़ी कम्पनियों में ये अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इसके बाद 60% के करीब इंजनीयर लम्बे चौड़े खर्च के बाद 20-30 हजार का जॉब करने के लिए मजबूर हैं. इसके बाद बचे हुए 30% इंजीनियरिंग डिग्री धारकों के पास काम ही नहीं है.
यानी हर साल इंजीनियरिंग सीटें बढ़ाने का कोई फायदा देश को नहीं मिल रहा है. आज देश को 10 लाख प्लंबर और इलेक्ट्रीशियन जैसे तकनीशियनों की जरूरत है, 10 लाख इंजीनियरों की नहीं.
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