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रांची/डेस्क: शादी का मौसम हो और माहौल में ‘मस्ती’ न हो, ऐसा भला कैसे? ढोल-नगाड़ों के बीच अक्सर “थोड़ी-थोड़ी” वाली पार्टी भी चल ही जाती है लेकिन यही वह चीज है जिसे हमारी सनातन परंपरा हमेशा से अमर्यादित मानती आई हैं. शराब को अहंकार बढ़ाने वाली, बुद्धि भ्रमित करने वाली और पाप की दिशा में धकेल देने वाली कहा गया हैं. पर आखिर इस कठोर मनाही की जड़ कहां हैं.? इसका जवाब छिपा है एक बेहद रोचक पौराणिक प्रसंग में जो सीधे जुड़ा है शाप से.
वारुणि से लेकर गरुड़ पुराण तक: मदिरा पर कड़ा मत
वैदिक युग में ‘वारुणि पयं’ नाम का पेय प्रचलित था, जिसे समुद्र मंथन से प्राप्त वारुणि देवी से जोड़ा जाता हैं. इसके स्वाद और प्रभाव के कारण इसे असुरों ने अपनाया हैं. गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण दोनों में मदिरा को ‘नर्क का मार्ग’ माना गया हैं. कहा गया है कि मदिरा पीने से धर्म नष्ट होता है और लक्ष्मी भी रुष्ट हो जाती है लेकिन शराब पर सबसे बड़ा और निर्णायक निषेध आया महाभारत के एक प्रसंग में जहां असुर गुरु शुक्राचार्य ने स्वयं एक शाप दिया था.
कच और शुक्राचार्य की कहानी
देवताओं और असुरों के बीच लगातार चल रहे युद्ध में शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या बड़ी शक्ति थी. असुर मरकर भी युद्ध में वापस आ जाते थे. इसी विद्या को सीखने देवताओं ने देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच को भेजा. कच की गुरुभक्ति और योग्यता देखकर शुक्राचार्य ने उसे शिष्य बना लिया, पर असुरों को यह रास नहीं आया. उन्होंने तीन बार कच की हत्या की:
पहली बार: कच को मारकर शरीर गायब कर दिया, पर शुक्राचार्य ने जीवित किया.
दूसरी बार: काटकर हिंसक जानवरों को खिला दिया, संजीवनी से फिर जीवित हुआ.
तीसरी बार: कच को मारकर जलाया गया
उसके राख को मदिरा में मिला दिया गया, जिसे शुक्राचार्य ने ही पी लिया. जब देवयानी ने आग्रह किया, तो शुक्राचार्य असमंजस में थे क्योंकि अब कच उनके पेट के भीतर था. यहीं से शुरू हुआ ‘शराब का शाप’. कच को पेट में जीवित करने से पहले शुक्राचार्य को गहरा क्रोध आया. उन्होंने घोषणा की थी कि ब्राह्मण कभी मदिरा का सेवन नहीं करेंगे. जो ऐसा करेगा, वह जीवित ही नर्क का भागी बनेगा. उनके मुताबिक मदिरा पीना ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मण की हत्या जैसा पाप हैं. उसी क्षण मदिरा को एक शाप मिला और सनातन परंपरा में शराब पर कठोर मनाही की शुरुआत हुई.
कच ने पेट में ही सीखी संजीवनी विद्या
शुक्राचार्य ने अंततः अपने भीतर मौजूद कच को वह विद्या सिखाई. विद्या सीखने के बाद कच ने शुक्राचार्य का आदेश मानकर उनका पेट फाड़कर बाहर आने के बाद उन्हें फिर से जीवित भी किया. यह गुरु-भक्ति का अद्भुत उदाहरण माना जाता हैं. उधर देवयानी ने कच को प्रेम प्रस्ताव दिया, जिसे कच ने गुरु-पुत्री मानकर अस्वीकार किया. क्रोधित देवयानी ने कच को संजीवनी विद्या भूलने का शाप दे दिया.
आज भी क्यों कही जाती है शराब से दूरी की बात?
शुक्राचार्य का दिया शाप और ग्रंथों का मत आज भी एक सांस्कृतिक संदेश देता है कि शराब बुद्धि को भ्रमित करती है, निर्णय खराब करती है और कई त्रासद घटनाओं का कारण बनती हैं. इसीलिए शादी जैसे शुभ अवसरों पर भी इसे मर्यादा से दूर रखा गया हैं.
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