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रांची/डेस्क: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने हाल ही में एक POCSO मामले में बड़ा फैसला सुनाया हैं. कोर्ट ने युवक के खिलाफ दर्ज केस को रद्द करते हुए कहा कि यह मामला प्रेम से प्रेरित था, वासना से नहीं. दरअसल, आरोपी और पीड़िता अब कानूनी रूप से विवाहित हैं और उनका एक बच्चा भी हैं. कोर्ट ने यह भी पाया कि पीड़िता अपने पति के साथ शांतिपूर्वक रहना चाहती है, इसलिए आरोपी के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा.
यह मामला चंपावत की विशेष सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित था. आरोपी और पीड़िता के बीच विवाद के चलते युवक पर POCSO कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था. इस कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है, यानी यह कानून तब लागू होता है जब पीड़िता या पीड़ित 18 वर्ष से कम आयु का हो.
हाई कोर्ट का फैसला
सुनवाई के दौरान जस्टिस आलोक मेहर ने कहा कि मुकदमे को जारी रखना या आरोपी को जेल भेजना परिवार को अशांत कर देगा. ऐसे हालात में कार्यवाही जारी रखना न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अपराध प्रेम से प्रेरित था, वासना से नहीं और पीड़िता भी अपने पति के साथ रहना चाहती हैं.
पीड़िता ने दी अपनी सहमति
हाई कोर्ट में दायर याचिका में बताया गया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो चुका था और उन्होंने अपनी इच्छा से शादी कर ली थी. पीड़िता ने कोर्ट में अपने बालिग होने के प्रमाण भी पेश किए, जिसमें आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि शामिल हैं. याचिका में कहा गया कि पीड़िता ने 12 मई, 2023 को शादी की और 27 अक्टूबर, 2025 को उनका एक बेटा हुआ.
कानूनी विवाहित होने की अहमियत
कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी और पीड़िता कानूनी रूप से विवाहित हैं और दोनों साथ रहना चाहते हैं. ऐसे में POCSO मामले में कार्यवाही रद्द करना न्यायसंगत हैं. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना कानून का उद्देश्य है, लेकिन इस मामले में पीड़िता अब बालिग है और उनकी सहमति के साथ विवाह हो चुका हैं. कानून विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला प्रेम और सहमति के बीच अंतर को स्पष्ट करता हैं. न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि POCSO का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, न कि विवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनी संबंधों पर कार्रवाई करना.
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