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रांची/डेस्क: इसे संयोग कहा जाए या नियति, लेकिन अंततः अजित दादा पवार की पहचान उनकी कलाई पर बंधी घड़ी से ही हो सकी. विमान हादसा इतना भीषण था कि अधिकांश शव पूरी तरह झुलस चुके थे, जिससे उनकी पहचान करना बेहद कठिन हो गया था. ऐसी स्थिति में अजित पवार की शिनाख्त उनकी कलाई पर मौजूद घड़ी के माध्यम से की गई. हादसे के बाद शव इस कदर जल चुके थे कि सामान्य पहचान के सभी साधन असफल हो गए थे. तब एकमात्र सहारा वही घड़ी बनी, जिसने उनकी पहचान सुनिश्चित की.
यह घटना इसलिए भी अधिक विडंबनापूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अजित पवार की पार्टी (NCP-अजित गुट) का चुनाव चिह्न भी घड़ी ही है. इसी चुनाव चिह्न को लेकर उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी, और अब जीवन के अंतिम क्षणों में वही घड़ी उनकी पहचान का आधार बनी. कई लोग इसे नियति का खेल मान रहे हैं कि जिस घड़ी ने उन्हें राजनीतिक पहचान दिलाई, वही घड़ी अंततः उनकी व्यक्तिगत पहचान भी बनी. हालांकि, आज यह घड़ी हमेशा के लिए थम चुकी है.
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