राहुल कुमार/न्यूज11 भारत
शेरघाटी/डेस्क: शेरघाटी प्रखंड के चिलिम पंचायत अंतर्गत वार्ड संख्या 16 महमदपुर भुइटोली में सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना करीब एक साल से ठप पड़ी है. मामूली तकनीकी खराबी और पीएचईडी विभाग की घोर लापरवाही के कारण करीब सौ महादलित परिवारों को पीने के पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है.
वार्ड सदस्य अशोक मांझी ने बताया कि फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में नल-जल योजना खराब हो गई थी. इसकी सूचना तत्काल पीएचईडी विभाग के कनीय अभियंता शुभम कुमार को दी गई थी. उस समय अभियंता ने आश्वासन दिया था कि एक-दो दिनों के भीतर मैकेनिक भेजकर योजना दुरुस्त करा दी जाएगी, लेकिन आश्वासन के करीब दस महीने बीत जाने के बाद भी आज तक न तो मैकेनिक पहुंचा और न ही नल से पानी टपका.
दूसरे के घर और बांध से लाना पड़ रहा पानी
ग्रामीण गोविंद दास, शिवनाथ दास, आशा देवी, बेबी कुमारी सहित दर्जनों ग्रामीणों ने बताया कि नल-जल बंद होने के बाद से उन्हें मजबूरी में दूसरे लोगों के घरों से या फिर बांध में लगे मोटर पंप के सहारे पानी लाना पड़ता है. महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक परेशानी झेलनी पड़ रही है. कई बार तो पीने के पानी के लिए भी संकट खड़ा हो जाता है.
बाइट देने से विभागीय कर्मचारियों ने किया इनकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब न्यूज 11 चैनल के पत्रकार राहुल कुमार ने पीएचईडी विभाग के कर्मचारियों से बाइट लेने का प्रयास किया, तो कर्मचारियों ने कैमरे के सामने कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया. हालांकि बाइट देने से बचते हुए कर्मचारियों ने यह जरूर कहा कि नल-जल योजना को “कल से परसों तक” दुरुस्त कर दिया जाएगा.
जेई और वार्ड सदस्य के बयान में विरोधाभास
इस संबंध में पूछे जाने पर कनीय अभियंता शुभम कुमार ने दावा किया कि उन्होंने स्टार्टर ठीक कराने के लिए अपने निजी खर्च से वार्ड सदस्य को पैसा दिया था. यदि अब तक मरम्मत नहीं हुई है तो जल्द इसे ठीक करा दिया जाएगा.
वहीं वार्ड सदस्य अशोक मांझी ने जेई के दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि करीब दो साल पहले स्टार्टर खराब होने पर पैसा दिया गया था, जिससे उस समय मरम्मत कराई गई थी. उसके बाद विभाग की ओर से कोई राशि नहीं दी गई है.
जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द नल-जल योजना दुरुस्त नहीं की गई, तो वे मजबूर होकर प्रखंड और जिला स्तर पर आंदोलन करने को विवश होंगे. सरकार की योजना कागजों में चल रही है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.
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