न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क :
पटना | विशेष रिपोर्ट- बिहार की राजनीति एक बड़े मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। साल 2005 से सत्ता की चाबी अपने पास रखने वाले नीतीश कुमार अब सक्रिय राजनीति से दूरी बनाते दिख रहे हैं, जिससे राज्य में नए राजनीतिक समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। लंबे समय तक “किंगमेकर” की भूमिका निभाने वाली नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने बिहार की सत्ता में अहम भूमिका निभाई। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि उनके बिना JDU का भविष्य क्या होगा, क्योंकि बिहार में मतदाता अक्सर पार्टी से ज्यादा चेहरे को महत्व देते रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति अब तीन प्रमुख ध्रुवों में सिमटती जा रही है—लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की अगुवाई वाली आरजेडी (RJD), दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP), और तीसरे ध्रुव के रूप में JDU.बीते वर्षों में नीतीश के पारंपरिक वोट बैंक का एक हिस्सा धीरे-धीरे BJP की ओर शिफ्ट होता देखा गया है। वहीं, राज्य की राजनीति में जाति आधारित समीकरणों की पकड़ कुछ कमजोर होती दिख रही है, जबकि धर्म आधारित ध्रुवीकरण का प्रभाव बढ़ रहा है।
हालांकि, नीतीश कुमार के शासनकाल को सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए भी याद किया जाता है। महिला सशक्तिकरण, पंचायतों में आरक्षण, नशाबंदी और विकास योजनाओं ने बिहार की छवि बदलने में अहम भूमिका निभाई। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि प्रवासी बिहारियों और युवा मतदाताओं की सोच में बदलाव आया है, जो अब जाति से ऊपर उठकर विकास, रोजगार और पहचान के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस बदलाव को BJP और उससे जुड़े संगठनों ने मजबूती से साधने की कोशिश की है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जेडीयू नीतीश कुमार के बिना अपनी पहचान और जनाधार को बनाए रख पाएगी, या बिहार की राजनीति पूरी तरह नए चेहरे और नए समीकरणों के साथ आगे बढ़ेगी? अब आगे देखना होगा कि बिहार की राजनीति में कौन सा नया मोड़ सामने आता है।
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