झारखंड

रांची की महिलाओं की अनोखी पहल: इस बार दिवाली में गोबर के दीयों से रोशन होंगे घर, पर्यावरण को भी मिलेगा संदेश

न्यूज11भारत

रांची/डस्क: दीपोत्सव का पर्व 20 अक्तूबर को मनाया जाएगा, इस बार यह पर्व विशेष रूप से रोचक होने वाला है. बाजार में दीयों की नई किस्में पेश की जाएंगी. दरअसल, इस दिवाली रांची के घर और आंगन गोबर से बने दीयों की रोशनी और खुशबू से महक उठेंगे. 

दीपावली तक दो लाख दीयों का निर्माण करने का लक्ष्य

सुकुरहुटू गोशाला, चापूटोला अरसंडे और धुर्वा सीठियो में 90 महिलाएं मिलकर करीब 7 लाख दीये तैयार कर रही हैं. इन दीयों को शुद्धता और पारंपरिकता के साथ बनाया जा रहा है.  और घरों और आंगनों को केवल मिट्टी के टेराकोटा दीयों से ही नहीं, बल्कि गोबर से बने दीयों की रोशनी से भी सजाया जाएगा. रांची के सुकुरहुटू और बोड़ेया गांवों में इस समय दिन-रात गोबर से दीये मशीनों के माध्यम से बनाए जा रहे हैं. कारीगरों ने दीपावली तक दो लाख दीयों का निर्माण करने का लक्ष्य रखा है.

इनमें कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के टेराकोटा दीये 100 रुपये सैकड़ा, फार्मा दीये 500 रुपये सैकड़ा, 5 रुपये प्रति पीस, चाक से बने दीये 150 रुपये सैकड़ा, और रंग-बिरंगे फैंसी दीये 10 रुपये प्रति पीस उपलब्ध होंगे. इस बार खरीदारों के लिए दीयों का संग्रह और भी विविधतापूर्ण और आकर्षक होगा.

चाक से बने दीयों की संख्या केवल 1 प्रतिशत कुम्हारों का कहना है कि अब मिट्टी प्राप्त करना आसान नहीं रह गया हैं. शहरीकरण के कारण स्थान की कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई है. धुआं और प्रदूषण के चलते पारंपरिक चाक की कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है.  वर्तमान में रांची में पारंपरिक चाक से बने दीयों की संख्या केवल 1 प्रतिशत रह गई है, और आने वाली पीढ़ी शायद इस कला को देख भी नहीं पाएगी. शहर में मिट्टी, कोयला और लकड़ी की उपलब्धता कम हो गई है, जिससे दीयों की कमी हो रही है. इस स्थिति के कारण अब चाक के बजाय मशीनों से दीये बनाए जा रहे हैं. दीये बेचने के लिए अब ठाकुर गांव, नगड़ी, बोड़ेया, हरदाग, बलसगरा, पलामू और बंगाल से दीये मंगवाने की आवश्यकता पड़ रही हैं. 

 करोड़ों रुपये का हो सकता है दीयों का व्यापार पिछले वर्ष दीयों की कीमत 100–120 रुपये प्रति सैकड़ा थी, लेकिन इस बार बढ़ती लागत और मेहनत के कारण यह 150–200 रुपये प्रति सैकड़ा तक पहुंच सकती है. इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार दीयों का व्यापार करोड़ों रुपये का हो सकता है.

कुम्हारों की पारंपरिक कला हो रही धीरे-धीरे समाप्त एक ओर, गोबर और मशीन से बने दीये बाजार में नई विविधता लाएंगे, वहीं दूसरी ओर कुम्हारों की पारंपरिक कला धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं. पहले शहर में हजारों कुम्हार परिवार दीपावली के समय चाक पर दीये बनाते थे, लेकिन अब इस व्यवसाय में केवल गिनती के ही कुम्हार बचे हैं.