बिहार में बदलता सत्ता संतुलन: लालू–नीतीश युग का अंत, नई राजनीतिक ताकत की तलाश- शिवानंद तिवारी
न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
पटना - नीतीश कुमार के सत्ता से अलग होने को महज़ एक राजनीतिक घटना नहीं कहा जा सकता। यह दरअसल बिहार की राजनीति के एक पूरे दौर के अंत का संकेत है। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार—दोनों ही चौहत्तर आंदोलन की उपज हैं, और करीब छत्तीस–सैंतीस वर्षों तक इन दोनों ने मिलकर बिहार की राजनीति की दिशा तय की।
हाईलाइट्स -
- लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर का अंत
- अति पिछड़ी जातियों के राजनीतिक रुझान ने बदला सत्ता संतुलन
- सामाजिक न्याय की राजनीति में असंतुलन से बढ़ा असंतोष
- 2005–2010 में नीतीश कुमार का स्वर्णकाल, बाद में बदली रणनीति
- बिना बड़े आंदोलन के सत्ता परिवर्तन से बना राजनीतिक शून्य
- भविष्य में नई राजनीतिक ताकत के उभरने की संभावना
लालू यादव का उभार और ऐतिहासिक मौके
इसमें कोई शक नहीं कि एक समय लालू यादव, नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा ताकतवर नेता थे। इतिहास ने उन्हें दो बड़े मौके दिए। पहला—मंडल कमीशन के समर्थन में खड़े होकर “सामाजिक न्याय” की लड़ाई को आगे बढ़ाने का मौका। दूसरा—उसी दौर में, जब लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम रथ यात्रा निकली और देश में सांप्रदायिक राजनीति ने जोर पकड़ा।
इसी क्रम में लालू यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को रोककर उन्हें गिरफ़्तार किया। इस घटना से उनकी देशभर में बड़ी पहचान बनी और वे सांप्रदायिकता के खिलाफ एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित हुए। लेकिन अगर गहराई से देखें तो सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय—दोनों ही सवालों पर उनके भीतर एक प्रकार की नाटकीयता भी दिखाई देती है।
बाबरी मस्जिद प्रसंग और राजनीतिक विरोधाभास
उदाहरण के तौर पर 1992 का प्रसंग याद कीजिए। जब बाबरी मस्जिद को गिराने की घोषणा हुई, तब लालू यादव ने बिहार विधानसभा से एक जुलूस निकाला, जो डॉ. लोहिया की प्रतिमा तक गया। वहाँ उन्होंने घोषणा की कि अगर बाबरी मस्जिद को तोड़ने की कोशिश हुई, तो बिहार से करोड़ों लोग अयोध्या जाएंगे और मस्जिद को घेरकर उसकी रक्षा करेंगे। लेकिन जिस दिन बाबरी मस्जिद पर हमला हुआ, जब लोग गुंबद पर चढ़कर उसे तोड़ रहे थे, उस समय लालू यादव अपने कमरे में खाना खा रहे थे। यह दृश्य टेलीविजन पर प्रसारित हो रहा था। बाद में वे सो गए।
हमें याद है कि सरयू राय ने मुझे फोन पर बताया कि मस्जिद का एक गुंबद तोड़ दिया गया है और दूसरे को तोड़ने की कोशिश चल रही है। यह सुनकर मुझे गहरा धक्का लगा। तुरंत हम मुख्यमंत्री आवास पहुँचे। वहाँ नीचे ड्राइंग रूम में पत्रकार बैठे हुए थे—तत्कालीन विपक्ष के नेता जगन्नाथ मिश्रा की प्रतिक्रिया इस घटना पर लेने के बाद वे लोग लालू जी की प्रतिक्रिया के इंतजार में वहां बैठे थे। वहाँ मौजूद अधिकारी से पूछा तो बताया गया कि वे खाना खाकर सो रहे हैं। किसी को जगाने की हिम्मत नहीं थी. मैंने उपर जा कर जब उन्हें जगाया तो उनका जवाब था—“अरे, तोड़ दिया सब ! हम खाना खा रहे थे तो सब गुम्बद पर चढ़ गया था!
अब ज़रा सोचिए—जो नेता खुद को सांप्रदायिकता के खिलाफ सबसे बड़ी दीवार बताता था, जिसने यह दावा किया था कि वह करोड़ों लोगों को लेकर बाबरी मस्जिद की रक्षा करेगा, वही उस ऐतिहासिक क्षण में यह देखने के बाद भी कि गुंबद तोड़ा जा रहा है, नींद में चला गया! यह लालू जी की घोषणाओं और उन घोषणाओं के प्रति प्रतिबद्धता में कितना बड़ा फासला था, उसे दर्शाता है.
सामाजिक न्याय और असंतोष की जड़
सामाजिक न्याय के सवाल पर भी उनके साथ यही बात लागू होती है। सामाजिक न्याय की सबसे अधिक आवश्यकता उन लोगों को होती है जो सबसे नीचे हैं। लालू यादव या उनके अगल बगल की जातियां भी सामाजिक भेदभाव का शिकार रही थीं—इसमें कोई संदेह नहीं। उनके लिए भी बदलाव जरूरी था। लेकिन उनसे भी नीचे जो तबके थे, उनकी जरूरत और भी ज्यादा थी। लेकिन सामाजिक न्याय को इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि “हम अपने से ऊपर वालों को हटाकर खुद ऊपर बैठ जाएं और जो हमारे नीचे हैं, वे जैसे हैं वैसे ही बने रहें।” यही हुआ—और नीचे के तबकों में असंतोष बढ़ा। नतीजा यह हुआ कि वही अति पिछड़ी जातियाँ, जो निर्णायक भूमिका निभा सकती थीं, लालू यादव से अलग हो गईं और नीतीश कुमार के साथ चली गईं। यहीं से सत्ता का संतुलन बदला।
नीतीश कुमार का दौर और बदलाव
नीतीश कुमार के सामने भी वही चुनौती थी। उन्होंने अपने पहले कार्यकाल (2005–2010) में अति पिछड़ों और महिलाओं को आरक्षण देकर एक नई दिशा देने की कोशिश की। वह दौर उनके शासन का स्वर्णकाल कहा जा सकता है।लेकिन बाद के वर्षों में उनकी राजनीति बदलती गई। जो खुद को सांप्रदायिकता के खिलाफ बताते थे, नरेंद्र मोदी जी के साये तक से जिनको परहेज था. बाद में सत्ता के लिए नरेंद्र मोदी का पैर पकड़ने में भी उनको संकोच नहीं हुआ. और आज स्थिति यह है कि बिना किसी संघर्ष के उन्होंने सत्ता भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सौंप दी है।
संघर्ष की राजनीति से शून्य की स्थिति तक
अगर हम आज़ादी के बाद बिहार के इतिहास को देखें, तो सत्ता परिवर्तन हमेशा संघर्ष के माध्यम से हुआ है। 1965 के समाजवादी आंदोलन से 1967 में सरकार का बदलना, 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन—इन सभी ने नई पीढ़ी के नेतृत्व को जन्म दिया। संघर्ष से निकला नेतृत्व हमेशा अपने साथ एक सपना लेकर आता है—नए समाज के निर्माण का सपना। लेकिन आज स्थिति अलग है। आज सत्ता का परिवर्तन बिना संघर्ष के हुआ है। कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ, कोई वैचारिक उभार नहीं दिख रहा है. इसलिए आज बिहार की राजनीति में एक शून्य दिखाई देता है।
आगे क्या? नई ताकत का उभार
लेकिन प्रकृति का नियम है—शून्य कभी स्थायी नहीं रहता। जहाँ खालीपन होता है, वहाँ नई शक्तियाँ जन्म लेती हैं। आज नहीं दिख रहा, लेकिन आने वाले समय में बिहार की राजनीति में एक नई ताकत उभरेगी—जो इस खाली जगह को भरेगी।
- शिवानंद तिवारी से फेसबुर वॉल से
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