किसानों को सूखा प्रबंधन, जल संरक्षण एवं वैकल्पिक ख

सिमडेगा जिला स्तरीय खरीफ कर्मशाला: संभावित सुखाड़ से निबटने की तैयारी की गई

आशिष शास्त्री/न्यूज11  भारत

सिमडेगा/डेस्क:  सरकार के निर्देश पर खरीफ सीजन में संभावित कम बारिश की स्थिति में फसलों और किसानों को सुरक्षित रखने के लिए तैयार किए गए रोडमैप को समझने के लिए नगर भवन में जिला स्तरीय खरीफ कर्मशाला का आयोजन कृषि विभाग के द्वारा किया गया.

जिला स्तरीय खरीफ कर्मशाला का उद्घाटन डीसी सिमडेगा कंचन सिंह, जिप अध्यक्ष रोस प्रतिमा सोरेन और अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया. इसके बाद इस कर्मशाला में  खरीफ 2026 में सामान्य से कम वर्षा की संभावना और संभावित सुखाड़ के मद्देनजर आकस्मिक फसल योजना पर चर्चा की गई. किसानों को कम अवधि वाले फसल प्रभेद चुनने, मडुआ, दलहनी फसल और इंटरक्रॉपिंग के बारे में बताया गया. कर्मशाला में किसानों को कम अवधि वाले फसल प्रभेद का चयन करने, मडुआ की फसल लगाने, दलहनी फसल लगाने एवं इंटरक्रॉपिंग विधि, मल्चिंग विधि से खेती हेतु किसानो को प्रेरित करें तथा बिचडो को 10 दिनों के अंतराल पर लगाने तथा उपरी भूमि में उरद, मक्का, अरहर, मूंगफली, मडुवा आदि फसल लगाने के सुझाव देने की बात कही. किसानों को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग के संबंध में जागरूक करने की बात कही गई. इस हेतु यूरिया के स्थान पर लिक्विड नैनो यूरिया, एनपीके एवं एवं जैविक खाद एवं ढैचा घास के उपयोग को बढ़ावा देने को कहा गया. इसके साथ किसानों को फसल बीमा के लिए भी प्रेरित किया गया.कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को संभावित सूखे, कम वर्षा की स्थिति तथा मौसम आधारित खेती के प्रति जागरूक करना, ताकि आने वाले खरीफ मौसम में किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती कर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकें.

डीसी सिमडेगा ने कर्मशाला में उपस्थित किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि बदलते मौसम और संभावित सूखे की स्थिति को देखते हुए अभी से तैयारी करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है. सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि और किसान यदि मिलकर योजनाबद्ध तरीके से कार्य करें तो किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस कर्मशाला का मुख्य उद्देश्य किसानों को जागरूक करना तथा उन्हें वैज्ञानिक खेती, जल संरक्षण और वैकल्पिक फसलों के प्रति प्रेरित करना है. उन्होंने कहा कि मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है. ऐसे में किसानों को कम पानी में होने वाली फसलों, उन्नत बीजों और आधुनिक कृषि तकनीकों की ओर ध्यान देना होगा. तकनीकी सत्र में कृषि विशेषज्ञ किसानों को खेती की नई पद्धतियों, सूखा प्रबंधन और फसल चयन की जानकारी देंगे. डीसी ने कहा कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में झारखंड सरकार किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए लगातार कार्य कर रही है. बीज वितरण, खाद वितरण, सिंचाई योजनाएं, पोषाहार राशि तथा विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से किसानों को सहायता दी जा रही है. उन्होंने कहा कि मड़ुआ की खेती करने वाले किसानों को प्रति एकड़ 03 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है, ताकि किसान पारंपरिक और पोषक फसलों की खेती की ओर बढ़ें. उन्होंने कहा कि आज समाज में खेती को कम महत्व का कार्य समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि किसान ही वास्तविक “अन्नदाता” हैं. किसान ही वह व्यक्ति है जो धरती का सीना चीरकर अन्न उपजाता है और पूरे समाज का पेट भरता है. यदि खेती कमजोर होगी तो समाज भी कमजोर होगा. इसलिए किसानों का सम्मान और कृषि का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है. डीसी ने कहा कि किसानों का अनुभव, पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक तकनीक और सरकार का सहयोग जब एक साथ जुड़ता है तो खेतों से “सोना उगलने” लगता है. उन्होंने कहा कि हाल ही में लगभग 200 एकड़ क्षेत्र में लहलहाती गरमा मड़ुआ फसल का उदाहरण देते हुए कहा कि कम पानी में भी बेहतर खेती संभव है. वहां प्रशासन द्वारा लिफ्ट इरिगेशन की व्यवस्था की गई और किसानों की मेहनत से उत्कृष्ट उत्पादन प्राप्त हुआ.

जल संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए डीसी सिमडेगा ने कहा कि आने वाले समय में पानी सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है. उन्होंने किसानों से अपील की कि तालाब, डोभा और अन्य जलस्रोतों की समय रहते सफाई और गहरीकरण करें, ताकि वर्षा जल का संरक्षण हो सके. उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों के पास जल संरक्षण का गहरा अनुभव था और आज आवश्यकता है कि हम उस ज्ञान को फिर से अपनाएं. उन्होंने कहा कि जलमीनार और नल की सुविधा मिलने के बाद लोग पानी का महत्व भूलते जा रहे हैं. अंधाधुंध जल उपयोग के कारण भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है. सिमडेगा जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में कई स्थानों पर 300-400 फीट बोरिंग कराने के बाद भी पानी नहीं निकलता. इसलिए पानी की एक-एक बूंद का संरक्षण जरूरी है.

डीसी ने किसानों को धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों पर पूरी तरह निर्भर न रहने की सलाह देते हुए कहा कि मड़ुआ, गोंदली, उड़द, राहर जैसी कम पानी में होने वाली पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देना चाहिए. उन्होंने कहा कि जिले में सूरजमुखी, फूलों की खेती, आम, कटहल, इमली और चिरौंजी जैसी फसलों में भी अपार संभावनाएं हैं. प्रशासन द्वारा किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि इस वर्ष जिले का लगभग 81 मीट्रिक टन आम राज्य से बाहर भेजा जा रहा है.

डीसी ने कहा कि नई पीढ़ी को कृषि से जोड़ना और आधुनिक तकनीक के साथ खेती की ओर आकर्षित करना आवश्यक है. उन्होंने किसानों से अपनी फसलों का बीमा कराने की भी अपील की, ताकि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में नुकसान की भरपाई हो सके. उन्होंने कहा कि कर्मशाला में प्राप्त जानकारी को गांव-गांव तक पहुंचाना जरूरी है, ताकि अधिक से अधिक किसान सरकारी योजनाओं और आधुनिक तकनीकों का लाभ उठा सकें. उन्होंने विश्वास जताया कि किसानों की मेहनत, वैज्ञानिक सोच और सरकार के सहयोग से सिमडेगा कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि निर्यातक जिला भी बन सकता है.

जिला कृषि पदाधिकारी, सिमडेगा माधुरी टोप्पो ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष कम वर्षा की संभावना व्यक्त की गई है. ऐसे में किसानों को मौसम आधारित खेती अपनाने और संभावित सूखे से निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी. उन्होंने कहा कि ऊपरी जमीन में मड़वा, उड़द, सोरजिया एवं मक्का जैसी सूखा सहन करने वाली फसलों की खेती करनी चाहिए, जबकि मध्यम भूमि में ज्वार, बाजरा और चारा फसलें लाभकारी होंगी.

उन्होंने किसानों को कम अवधि वाले धान की प्रजातियों जैसे सबहागी, बनगना, टीआर-800, आईआर-64 एवं डीआरटी का चयन करने की सलाह दी. साथ ही खेतों की समय पर जुताई, मेड़बंदी और छोटे-छोटे डोभा बनाकर वर्षा जल संरक्षण करने की अपील की. उन्होंने संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी जांच, गोबर खाद एवं डोलोमाइट के उपयोग पर भी जोर दिया. श्रीमती टोप्पो ने बताया कि विभाग द्वारा लगभग चार हजार क्विंटल बीज की मांग की गई है और किसान लैम्पस के माध्यम से 50 प्रतिशत अनुदान पर बीज प्राप्त कर सकते हैं.

जिला परिषद अध्यक्ष रोस प्रतिमा सोरेंग ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि इस वर्ष कम वर्षा और सूखे जैसी स्थिति बनने की संभावना है. इसलिए किसानों को अभी से सतर्क और तैयार रहना होगा. उन्होंने कहा कि कम पानी में होने वाली फसलों का चयन कर खेती करना समय की आवश्यकता है. खेतों की समय पर जुताई, मजबूत मेड़बंदी और नमी संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

उन्होंने किसानों को ऊपरी खेतों में मड़वा, गोड़ा धान, मक्का तथा अन्य कम पानी वाली फसलों की खेती करने की सलाह दी. साथ ही सिंचाई सुविधाओं को अपनाने और जल संरक्षण के प्रति गंभीर होने की अपील की.

नगर परिषद अध्यक्ष ओलिभर लकड़ा ने कहा कि कृषि केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. किसानों को आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज, खाद और बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि पारंपरिक खेती के साथ वैज्ञानिक एवं बहुफसली खेती अपनाकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है.

उन्होंने महिला समूहों और किसान समूहों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सामूहिक प्रयास से कृषि क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है. उन्होंने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से पंचायत स्तर तक जागरूकता अभियान चलाने का आग्रह किया.

अपर समाहर्ता, सिमडेगा ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि इस वर्ष वर्षा कम होने की संभावना है, इसलिए किसानों को कम पानी में होने वाली फसलों का चयन करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में धान का बिचड़ा तैयार करें ताकि आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई की जा सके.

उन्होंने किसानों से केवल धान पर निर्भर न रहकर मड़वा, राहर, कुर्ती, उड़द और सब्जी फसलों की खेती अपनाने की अपील की. उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण से किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी और नुकसान की संभावना कम होगी.

कार्यक्रम में अपर समाहर्ता ज्ञानेन्द्र, जिला मत्स्य पदाधिकारी सीमा टोप्पो, जिला, जिला अग्रणी प्रबंधक सनिश मिंज, जिला पशुपालन पदाधिकारी, सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं बड़ी संख्या में किसान उपस्थित थे.

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