झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य शिक्षा सेवा की अधिकारी फर

पुनर्बहाली के बाद निलंबन पर हाईकोर्ट सख्त, शिक्षा सचिव तलब

न्यूज़11 भारत  रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य शिक्षा सेवा की अधिकारी फरहाना खातून से जुड़े अवमानना मामले में राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि हाई कोर्ट के आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने बुधवार को सुनवाई के दौरान पाया कि पूर्व में दिए गए आदेश के बावजूद न तो अधिकारी को विधिवत सेवा में लिया गया और न ही उन्हें वेतन का भुगतान किया गया. इस पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव उमाशंकर सिंह को 14 अगस्त को सशरीर उपस्थित होने का निर्देश दिया है.

इससे पहले हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि एक ही आदेश में फरहाना खातून की पुनर्बहाली और निलंबन कैसे किया गया. कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे त्रुटिपूर्ण मानते हुए सरकार को आदेश की समीक्षा करने और इस संबंध में शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया था.

हालांकि, बाद की सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से न तो कोई एफिडेविट दाखिल किया गया और न ही कोई शोकॉज. सरकार ने केवल मौखिक रूप से यह दलील दी कि संबंधित आदेश कैबिनेट की मंजूरी से पारित हुआ है, इसलिए उसे पुनर्विचार करना संभव नहीं है.

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रेम पुजारी राय ने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट पहले ही बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर पुनर्बहाली का निर्देश दे चुका है. इसके बावजूद फरहाना खातून को न तो सेवा में लिया गया और न ही 18 नवंबर 2025 से अब तक का वेतन भुगतान किया गया, जबकि वे उस तिथि से वेतन की हकदार हैं.

कोर्ट को यह भी बताया गया कि विभागीय जांच छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया था, जिसकी समयसीमा अप्रैल 2026 में समाप्त हो चुकी है. इसके बावजूद न तो कोई चार्जशीट दी गई, न ही जांच पूरी की गई और न ही समय विस्तार के लिए कोई आवेदन दाखिल किया गया.

सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि यदि अधिकारी को निलंबित माना जा रहा है, तो उन्हें नियमानुसार जीवन-निर्वाह भत्ता (सब्सिस्टेंस अलाउंस) भी नहीं दिया जा रहा है. इन सभी तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह न्यायालय के आदेश की अवहेलना है और इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इसे कानून का मजाक बताते हुए सचिव को तलब किया है.

अब सचिव को 14 अगस्त को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करना होगा कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद बहाली क्यों नहीं की गई? अब तक वेतन या भत्ता भुगतान क्यों नहीं हुआ? एक ही आदेश में बहाली और निलंबन क्यों किया गया और इस मामले में समान परिस्थितियों वाले अन्य अधिकारियों से अलग व्यवहार क्यों अपनाया गया?