झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) के एक

कथित संबंध के आरोप में बर्खास्त सिपाही को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, विभाग का आदेश रद्द

न्यूज़11 भारत  रांची/डेस्क: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) के एक बर्खास्त सिपाही को बड़ी राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है. जस्टिस दीपक रौशन की अदालत ने भारत पाठक उर्फ भारत कुमार पाठक की याचिका स्वीकार करते हुए विभाग द्वारा जारी बर्खास्तगी के आदेश, उसके बाद जारी परिणामी आदेश तथा अपील खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को सभी बकाया वेतन (Back Wages) और अन्य सेवा लाभों के साथ पुनः सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया.

क्या था मामला भारत पाठक वर्ष 2007 से झारखंड आर्म्ड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत थे. वर्ष 2023 में एक महिला ने कमांडेंट, JAP-10 के समक्ष शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया कि भारत पाठक ने उससे विवाह किया और वर्ष 2019 से 2023 के बीच पति-पत्नी की तरह संबंध बनाए, लेकिन बाद में उसे अपनाने से इनकार कर दिया. शिकायत के आधार पर प्रारंभिक जांच कराई गई. जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि भारत पाठक और शिकायतकर्ता महिला दोनों पहले से शादीशुदा थे तथा दोनों के बच्चे भी थे. विभागीय जांच के अनुसार, दोनों की मुलाकात ऑनलाइन हुई थी और बाद में वे कथित रूप से आपसी सहमति से विभिन्न होटलों और किराए के मकानों में पति-पत्नी की तरह साथ रहे. बाद में दोनों के बीच विवाद होने पर महिला ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर चुटिया थाना में IPC की धारा 417 और 376(2)(n) के तहत प्राथमिकी भी दर्ज की गई. इसके बाद विभागीय कार्रवाई शुरू कर उन्हें निलंबित कर दिया गया.

विभागीय जांच पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में चार गवाहों से पूछताछ की गई, लेकिन जांच अधिकारियों ने जिरह के दौरान स्वयं स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता के आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र दस्तावेजी साक्ष्य नहीं था. कथित विवाह का कोई प्रमाण, होटल का CCTV, किराए के मकान का रिकॉर्ड या अन्य स्वतंत्र गवाह भी उपलब्ध नहीं कराया गया था. जांच रिपोर्ट केवल शिकायतकर्ता के बयान पर आधारित थी.

आरोप कुछ और, सजा किसी और आधार पर कोर्ट ने कहा कि विभागीय आरोपपत्र में जिस आरोप पर जांच हुई, अंतिम बर्खास्तगी आदेश उस आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर पारित किया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 376(2)(n) के तहत FIR दर्ज है. जबकि यह आरोप विभागीय चार्जशीट का हिस्सा ही नहीं था. अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी को उसी आरोप के आधार पर दंडित किया जा सकता है जो आरोपपत्र में शामिल हो. चार्जशीट से बाहर के आरोपों पर सजा देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है.

आदेश को बताया "नॉन-स्पीकिंग" हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी दोनों ने याचिकाकर्ता के जवाब पर कोई ठोस विचार नहीं किया. आदेशों में यह नहीं बताया गया कि किन साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध माने गए. केवल FIR दर्ज होने को आधार बनाकर बर्खास्तगी कर दी गई, जो कानून की दृष्टि में उचित नहीं है.

व्यभिचार अब अपराध नहीं अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Joseph Shine बनाम Union of India फैसले का हवाला देते हुए कहा कि व्यभिचार (Adultery) अब आपराधिक अपराध नहीं है. इसलिए केवल इस आधार पर किसी कर्मचारी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती.

हाईकोर्ट की टिप्पणी कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोप विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध हुए हैं. विभागीय अधिकारियों ने स्वतंत्र प्रमाणों के बजाय केवल आरोपों की गंभीरता को आधार बनाकर कार्रवाई की. ऐसी कार्रवाई मनमानी, असंगत तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है.

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 31 दिसंबर 2024 को जारी बर्खास्तगी के आदेश, 14 जनवरी 2025 के परिणामी आदेश तथा 4 दिसंबर 2025 को अपील खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता भारत पाठक को झारखंड आर्म्ड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर सभी बकाया वेतन (बैक वेज) और अन्य सेवा संबंधी लाभों के साथ पुनः बहाल किया जाए. इसके साथ ही अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए लंबित अंतरिम आवेदन (आईए), यदि कोई हो, का भी निष्पादन कर दिया.