सिस्टम की बेरुखी, पलामू में टूटे आशियाने और लाचारी के बीच छह बच्चों के साथ जीने को मजबूर दिव्यांग दंपत्ति
संतोष श्रीवास्तव/न्यूज़11 भारत पलामू/डेस्क: प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई कितनी गहरी हो सकती है, इसका जीता-जागता उदाहरण पलामू जिले के चैनपुर क्षेत्र अंतर्गत अवसाने गांव के बरवाटोली टोले में देखने को मिला है. यहाँ डाल्टनगंज जिला मुख्यालय से महज लगभग 32 किलोमीटर की दूरी पर रहने वाले दिव्यांग चिंटू चौधरी और उनकी पत्नी प्रीति देवी पिछले 10 वर्षों से अपने छह मासूम बच्चों के साथ एक बेहद जर्जर, कच्चे और टूटे-फूटे मकान में रहने को विवश हैं. यह लाचार परिवार सालों भर चाहे चिलचिलाती गर्मी हो, हाड़ कपाने वाली ठंड या फिर मूसलाधार बारिश, इसी असुरक्षित झोपड़ीनुमा घर में अपनी जिंदगी काटने को मजबूर है. शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के कारण चिंटू चौधरी के लिए आजीविका चलाना और बच्चों का पेट पालना एक कड़ा संघर्ष साबित हो रहा है. विडंबना यह है कि चलने-फिरने के लिए उनके पास जो ट्राइसाइकिल है, वह भी पूरी तरह टूट चुकी है, जिससे उनकी लाचारी और अधिक बढ़ गई है.
पीड़ित प्रीति देवी और चिंटू चौधरी का कहना है कि वे दोनों पूरी तरह दिव्यांग हैं और बीते दस वर्षों से इस टूटी झोपड़ी में रह रहे हैं. उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है, जिससे वे अपने छह बच्चों को पढ़ा-लिखा सकें या सही से खाना खिला सकें. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि उन्हें रहने के लिए एक घर और कमाने-खाने के लिए कोई रोजगार का साधन (जुगाड़) मुहैया कराया जाए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने बच्चों का भविष्य संवार सकें. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दिव्यांग होने की वजह से यह परिवार खुद सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने में असमर्थ है, लेकिन इसके बावजूद आज तक कोई भी प्रशासनिक अधिकारी इस असहाय परिवार की सुध लेने उनके दरवाजे तक नहीं पहुंचा.
इस घोर उपेक्षा के बीच अब इस परिवार की एक छोटी बच्ची ने हिम्मत दिखाते हुए सोशल मीडिया के जरिए पलामू उपायुक्त (डीसी) से अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित आशियाना बनवाने की भावुक गुहार लगाई है. बच्ची का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हर संवेदनशील दिल पसीज उठा है.
इस पूरे मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधि यानी मुखिया की भूमिका भी पूरी तरह टालमटोल वाली नजर आ रही है. मुखिया का कहना है कि उन्होंने अपने स्तर से जिला मुख्यालय में आवेदन दिए थे, लेकिन वहां से कोई समाधान नहीं हुआ. हालांकि, मुखिया का यह तर्क सिर्फ अपना पल्ला झाड़ने जैसा है. सच तो यह है कि अगर मुखिया और स्थानीय जनप्रतिनिधि वाकई गंभीर होते, तो इस दिव्यांग परिवार को बहुत पहले ही किसी न किसी सरकारी योजना का लाभ आसानी से दिलाया जा सकता था. बात सिर्फ वर्तमान की 'अबुआ आवास योजना' की नहीं है, इससे पूर्व भी कई वर्षों तक अन्य आवास योजनाएं संचालित थीं, जिनके तहत इस परिवार को प्राथमिकता के आधार पर घर मिल सकता था. लेकिन स्थानीय स्तर पर इच्छाशक्ति की कमी के कारण इस लाचार परिवार की फाइलें दबाकर रख दी गईं और आज मुखिया जी नियमों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं.
बहरहाल, मानसून की दस्तक के साथ ही इस पीड़ित परिवार की चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं. सवाल सीधे तौर पर हमारे सिस्टम और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर उठता है कि डाल्टनगंज मुख्यालय से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक दिव्यांग परिवार इस तरह मर्माहत करने वाली स्थिति में रहने को मजबूर है और जिम्मेदार लोग चैन की नींद सो रहे हैं. अब देखना यह होगा कि सोशल मीडिया पर मासूम बच्ची की इस मार्मिक अपील और दिव्यांग दंपत्ति के इस दर्द के सामने आने के बाद पलामू जिला प्रशासन वक्त रहते इस परिवार को आर्थिक सहायता और सुरक्षित आशियाना उपलब्ध कराता है, या फिर इन्हें जनप्रतिनिधियों के खोखले आश्वासनों के भरोसे आगे भी इसी तरह बेसहारा छोड़ दिया जाएगा.