सम्राट नहीं तो कौन होते मुख्यमंत्री! कांटो भरा ताज पहनते ही चौधरी की अग्नि परीक्षा शुरू
हाइलाइट्स
- नीतीश के 3C फार्मूला को आगे बढ़ाने की चुनौती
- नीतीश कुमार की तरह बेदाग छवि बनाए रखना
- भाजपा के विचारधारा को जनता के बीच विस्तारित करना
- चुनाव के समय जनता से किए वादे को पूरा करना
बिहार में बीजेपी का पहला मुख्यमंत्री कौन होगा, नाम को लेकर उहापोह की स्थिति कई दिनों तक बनी रही। आखिरकार सोमवार को केंद्रीय नेतृत्व द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षक शिवराज सिंह चौहान की देखरेख में सम्राट चौधरी को भाजपा विधान मंडल दल का नेता चुना गया। इसके बाद सोमवार को ही 4:30 बजे बिहार विधानसभा के विस्तारित भवन सेंट्रल हॉल में एनडीए विधानमंडल दल की बैठक में सम्राट चौधरी का नाम का मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्ताव लाया गया। इस पर एनडीए के तमाम घटक दल के विधान पार्षद और विधानसभा सदस्यों ने सहमति जताकर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री के तौर पर चुन लिया।
मंगलवार यानी 15 अप्रैल को सुबह 11 बजे सम्राट चौधरी को बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन में मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। सम्राट चौधरी के साथ जदयू की ओर से विजय चौधरी जो नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते हैं और बिजेंद्र यादव यह भी नीतीश कुमार के काफी करीबी नेता है। इन दोनों ने उपमुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह के लगभग 4 घंटे बाद मंत्रिमंडल के विभाग कभी बटवारा कर दिया गया। हालांकि विधायकों ने मंत्री के तौर पर शपथ नहीं ली है। लेकिन जब तक मंत्रिमंडल का गठन नहीं हो जाता। तब तक 29 विभाग मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास, विजय चौधरी के पास 10 विभाग और बिजेंदर यादव को आठ विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
बीजेपी अगर सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री नहीं बनाती तो किसे बनाती !
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब बीजेपी के अंदर ही यह सवाल उठ रहे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व में सम्राट चौधरी का ही चयन क्यों किया। जबकि बिहार बीजेपी में कई ऐसे चेहरे थे जो मुख्यमंत्री पद को बाखूबी संभाल सकते थे। बीजेपी के अंदर खाने यह चर्चा अभी भी जारी है। एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि सम्राट चौधरी भले ही 8 साल पहले भाजपा में आए हो। लेकिन उन्होंने बीजेपी के लिए जिस तरह का काम किया है वह जेडीयू और राजद में रहते भी नहीं कर सके थे। राजनीतिक विश्लेषक का मानना है कि सम्राट चौधरी न सिर्फ बढ़िया वक्ता हैं। बल्कि वह नीतीश कुमार की तरह सब को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने सम्राट चौधरी की इसी क्षमता को देखते हुए उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर बिहार की जिम्मेदारी दी है।
सम्राट नहीं तो संजीव हो सकते थे ऑप्शन
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि अगर बीजेपी सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री नहीं बनाती तो निश्चित तौर पर संजीव चौरसिया ही बिहार के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री होते। इसका सीधा कारण यह था कि संजीव चौरसिया का पूरा परिवार संघ से जुड़ा है। संजीव चौरसिया के पिता गंगा प्रसाद चौरसिया जनसंघ और बीजेपी के फाउंडर मेंबर लेने से एक रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेई मुरली मनोहर जोशी लालकृष्ण आडवाणी या संघ प्रमुख जब भी पटना पहुंचते थे। तो वह गंगा प्रसाद चौरसिया के घर ही रुका करते थे। अपने पिता की तरह संजीव चौरसिया भी बालसंघी है। इसके अलावा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में भी उन्होंने बेहतरीन काम किया है। फिलहाल वह लगातार दीघा विधानसभा क्षेत्र से दूसरी बार विधायक बने हैं। अगर बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व संजीव कुमार चौरसिया को मुख्यमंत्री बनाता तो जनता दल यूनाइटेड को और भी ज्यादा खुशी होती। क्योंकि संजीव चौरसिया का राजनीतिक जीवन अभी तक बेदाग रहा है। उन्होंने ना तो कोई कंट्रोवर्शियल बयान दिया है न ही पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ कोई बयान बाजी की न ही जदयू के खिलाफ। यानी उनके आज भी जदयू से बेहतर संबंध हैं।
ढाई साल से लगातार सम्राट चौधरी ही चला रहे थे बिहार सरकार
2020 विधानसभा चुनाव के बाद से ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर बीमार होने का आप विपक्ष द्वारा लगाए जाने लगा था। 2025 विधानसभा चुनाव के पहले तक राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन द्वारा नीतीश कुमार के सेहत को लेकर कई तरह के सवाल उठाए गए। विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवाल को लोग सच भी मान रहे थे। क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का व्यवहार मंच पर जिस प्रकार का था उससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि नीतीश कुमार वास्तव में स्वस्थ हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार के इसी अवस्था की वजह से उन्हें कैमरा और माइक से दूर रखा जाने लगा। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद कोई निर्णय ले पामें में असमर्थ साबित हो रहे थे। ऐसे में उपमुख्यमंत्री के तौर पर मौजूद सम्राट चौधरी ही अघोषित तौर पर न सिर्फ बड़े निर्णय ले रहे थे। बल्कि पिछले ढाई साल से सरकार भी वही चला रहे थे। इस दौरान सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बेहद करीब आ चुके थे।नीतीश कुमार भी वर्तमान के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर पूरा भरोसा करने लगे थे। यही वजह है कि केंद्रीय नेतृत्व में सम्राट चौधरी का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ाया जिस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी मुहर लगाई।
बीजेपी ने बिहार के समाजवाद और जातीय समीकरण को साधा
बिहार में उत्तर प्रदेश और असम की तरह हालात नहीं। बिहार की राजनीति जाति आधारित और समाजवाद पर चलती है। कांग्रेस के शासन के बाद से ही समाजवाद का नारा देने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का राज बिहार में रहा है। यही वजह है कि राम मंदिर आंदोलन को लेकर लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा निकाली गई रथ यात्रा का बिहार में बीजेपी को कोई लाभ नहीं मिला था। हालांकि वह दौर ऐसा था जब बीजेपी अपनी जमीन तैयार कर रही थी। अब बीजेपी राष्ट्रीय फलक पर न सिर्फ अपनी पहचान बन चुकी है बल्कि आधे से अधिक देश में अपनी सरकार भी बन चुकी है। देश से जातिवाद को तोड़ने और राष्ट्रवाद के साथ हिंदुत्व को बढ़ावा देने वाली भाजपा के लिए अब बिहार में भी अपनी जमीन को और मजबूत करने में सहूलियत होगी।
बीजेपी ने मुझे विचारधारा दिया : सम्राट चौधरी
कुछ दिन पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी यह कह चुके हैं कि वह लगातार 30 साल से अलग-अलग पार्टियों में कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं। पार्टी के कार्यकर्ता के साथ वह जनता के लिए भी उसी कर्मठता से काम कर रहे हैं। सम्राट चौधरी ने कहा था कि भले ही वह कर्मठ कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहे थे। लेकिन पहले की पार्टियों में उनकी कोई विचारधारा नहीं थी। भाजपा में आने के बाद उन्हें एक विचारधारा मिला है। अब वह बीजेपी के ही विचारधारा को आगे बढाने का काम कर रहे हैं। गौरतललब है कि जब से सम्राट चौधरी ने गृह मंत्रालय संभाला था। तभी से बिहार में अपराधियों का एनकाउंटर भी शुरू हो गया। यूपी की तर्ज पर बिहार में सम्राट चौधरी का बुलडोजर अभियान भी काफी फेमस हो रहा है, अब तो लोग उन्हें बिहार का बुलडोजर बाबा भी बुलाने लगे हैं। इसके अलावा सीमांचल के इलाके में घुसपैठियों को लेकर सम्राट चौधरी की जो सोच है। उसे देखकर लोग सम्राट चौधरी को बिहार का हिमंता विस्वा सरमा भी बोलते हैं।